शनिवार, 10 अप्रैल 2010

ये आरक्षण .....? अब्दुल्ला



ये जुमला सुनकर कई पाठक जरूर मुझे लालू, मुलायम और मायावती का समर्थक मान सकते हैं, मुझे पिछड़ा कह सकते हैं, मेरे लेख को सियासी लेख कह सकते हैं, लेकिन आज मुझे परवाह नहीं. भले ही मीडिया और ब्लाग के 'मार्शल्स' मुझे संसद के विरोधियों की तरह धकिया दें...मेरी बात को शायद कलावती जैसी ही समझेगी, जिसकी हंडिया में आरक्षण आचार से ज्यादा कुछ नहीं होगा- एक ऐसी 'चटक चीज' है जिससे पेट कतई नहीं भरने वाला, हर चटकारे के साथ भोजन की जरूर भूख बढाएगा. लेकिन हंडिया में होगा क्या- तो सिर्फ आचार, खाने का एक दाना नहीं. 'महिला आरक्षण पर इतिहास रचने' के सामूहिक स्लोगन पर जाने क्यों याद आ गई कलावती. विदर्भ की वही विधवा कलावती, जिसका हवाला देकर 'कांग्रेस के युवराज' ने संसद में देश की महिलाओं की हालत बखान की थी. महिलाओं के प्रति अपनी (और अपनी पार्टी) की संवेदनशीलता जताई थी. राहुल गांधी के हवाले के बाद वो कलावती भी सपना देखने लगी. राजनीति के जरिए अपनी और अपनी जैसी महिलाओं की दशा सुधारने की. राजनीति के जरिए विदर्भ की हालत बयां करने की. जाहिर है इसके लिए उसे चुनाव में उतरना होता. उसकी इच्छा रही होगी कि वो उसी राहुल की पार्टी से चुनाव में उतरे, जिसने उसका नाम पूरे देश में ऊंचा किया. उसने चुनाव लड़ने का ऐलान भी कर दिया. राहुल गांधी, कांग्रेस को भी ये बात पता चली. लेकिन टिकट कांग्रेस ने नहीं दिया, वो विदर्भ जनआंदोलन समिति के टिकट पर वानी विधान के मैदान में उतरी. राहुल अगर 'कलावती' के चिंतक होते, चुनाव में सियासी समकीरण के मारे नहीं होते, तो दौड़कर जाते कलावती का सपना पूरा करने, लेकिन नहीं...अब देखिए सियासत, इस बार राहुल भूल गए थे कलावती का हवाला. इस बार कांग्रेस कलावती से डर रही थी. आखिर सियासी 'पंजे' का इस्तेमाल कर कांग्रेस ने कलावती को बीच चुनाव में बैठने पर मजबूर कर दिया. जिन सज्जन ने कलावती को चुनाव की जगह समाज सेवा का पाठ पढ़ाया था, वो पुराने 'कांग्रेसमिजाजी' और सुलभ इंटरनेशनल के मुखिया बिन्देश्वर पाठक थे. पाठक जी ने कलावती को कुछ इन शब्दो में समझाया (जो कुछ अखबारों में छपा था)'मैं कलावती को कहना चाहूंगा, वो राजनीति की दीवार में सिर न भिड़ाए, वो अगर विदर्भ के लोगों की हालत हाईलाइट करना चाहती है, तो ये समाज सेवा के जरिए भी किया जा सकता है.'यानी तुम करो समाज सेवा, हम मारेंगे मलाई! पाठक जी की 'सलाह' का असर ये हुआ कि कलावती बीच चुनाव में बैठ गई. सियासी दबाव के आगे उसने विधान सभा में पहुंचकर अपनी बात रखने का सपना छोड़ दिया. अगर ऐसा है कलावती जैसियों के सपने का हश्र, तो महिला आरक्षण का क्या फायदा होगा? जैसा कि मीडिया एक सुर में चिल्ला रहा है.(खासकर हिंदी मीडिया) देश में महिलाओं की हालत के आंकड़े भला मीडिया से भी छिपे हैं क्या? वो नहीं जानते आज की तारीख में महिलाओं के लिए आरक्षण से ज्यादा सुरक्षा, घरेलू हिंसा, दहेज, शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्याएं बड़ी हैं? इन समस्याओं की आधी आबादी का कितना प्रतिशत तबाह हो रहा है, कितनी औरतों को इन समस्याओं के आगे देश क्या, अपने समाज की दशा और दिशा समझने की सुध नहीं रहती? अगर मीडिया वाले ये समझते हैं कि सियासत में उतरने से महिलाएं महिलाओं का कल्याण करेंगी, तो उनके सामने मायावती, राबड़ी देवी, जयललिता, उमा भारती, वसुंधरा राजे जैसियों के उदाहरण नहीं है. महिलाओं के लिए क्या खास किया है इन देवियों ने अपने राज में? कौन सा कल्याणकारी कार्य कर दिया इन्होंने? राजस्थान में, कि यूपी में, कि बिहार में, कि मध्य प्रदेश में, कि तमिलनाडु में, कहां सुधरी है महिलाओं की हालत? इनमें से कई देवियां तो घोटाले में मर्दों के भी कान काटने वाली हैं. क्या ये आंकड़े मीडिया की पहुंच के बाहर हैं? महिला कल्याण के मोर्चे पर कलावती का उदाहरण इन पार्टियों की फितरत समझने के लिए काफी नहीं? फिर ये भ्रम क्यों फैलाया जा रहा है कि महिला आरक्षण से 'सब कुछ' सुधर जाएगा?अगर मीडिया ये समझता है, कि महिला आरक्षण बिल के कानून बन जाने से पार्टियां महिलाओं को 33 फीसदी टिकट बांटने लगेंगी, तो क्या मीडिया का आकलन इतना घटिया हो गया है? जैसी इन पार्टियों की फितरत रही है, वो महिलाओं को किस अनुपात में प्रतिनिधित्व देंगें? अरे जो बीजेपी, जो कांग्रेस, जो लेफ्ट, आज तक अपनी नीयत या ईमानदारी किसी महिला को टिकट नहीं थमाया, महिलाओं को 'आधी आबादी; क्या, 'आबादी के दसवे हिस्से' का भी दर्जा नहीं दिया, वो अचानक महिलाओं के कल्याण के लिए सुर में सुर क्यों मिलाने लगीं?संसद में इतनी बड़ी नौटंकी क्यों. दागी और अपराधियों को टिकट देने के लिए यही पार्टियां कैसे कैसे बहाने देती हैं, कानूनी 'छेदों और परिच्छेदों' का बहाना देती हैं, कभी मिल जुलकर एकजुट होने और कानून बनाने की बात कह दो तो साफ कहते हैं- दागियों के खिलाफ एकजुटता मुमकिन नहीं, फिर आरक्षण पर इतने एकजुट कैसे हो गए? ऐसा लगता है जैसे महिलाओं को सीट देने में कोई कानूनी अड़चन आ रही थी, संसद में उसी बाधा को दूर करने के लिए एकजुट हो रहे हों. इसी एकजुटता से लालू और मुलायम के सवाल में सच्चाई नजर आती है- ये 33 फीसदी आरक्षण सीट हथियाने का हथकंडा हैलेकिन हैरत होती है मीडिया को देखकर (एक बार फिर कहना चाहूंगा खासकर हिंदी मीडिया) पार्टियों को छोड़िए, कि इनके सुर में ऐसे एकसुर हो गया मीडिया, कि कान तक नहीं दिया आरजेडी, एसपी, बीएसपी और दूसरे विरोधियों की दलीलों को. (अंग्रेजी में तो फिर भी बहस हुई, हिंदी में तो इतिहास रचने के सिवा कुछ स्लग ही नहीं सूझा) ये ठीक है, इनके आकाओं का खुद मुंह नहीं है महिला कल्याण का नारा देने का, न लालू की नीयत ठीक है, न मुलायम की, और मायावती की तो और भी नहीं, लेकिन इनके इशारों को बहस के बीच ही न घसीटा जाए, ऐसा भी तो नहीं होना चाहिए. संसद में नहीं हुआ, शायद विरोधियों का संख्या बल नहीं था, लेकिन मीडिया के मंच पर ऐसा क्यों, कि सबकी पट्टी एक हो गई- राज्यसभा ने रच दिया इतिहास!

मुंह में राम बगल में लड़की -----अनिल अनूप


मुंह में रामबगल में बालासाधु के चोलेमें देह का दलाल साधना साईं कीसंपर्क सोनू पंजाबण से साधना की आड़ मेंजिस्म का सौदागर आश्रम को बनायाअय्याशी का अड्डा ये है दिल्ली केसेक्स रैकेट का स्वामीदिल्ली के खानपुर के हैं बाबा. साईं बाबा के नाम पर मंदिर और आश्रम खोल रखा था. बाबा साधना तो करते थे साईं की, लेकिन संपर्क थे सोनू पंजाबण से (इंटर स्टेट सेक्स रैकेट की सरदार) ताना बाना बुन रखा था 500 लड़कियों के नेटवर्क का, जिन्हे बनारस से बॉम्बे, बैंगलुरू से कोलकाता तक के हाई सोसाइटी में सप्लाई करता था बाबा...ये तो बाबा के कर्म है, अब पढ़िए बाबा की एबीसी. बाबा चित्रकूट से हैं, तुलसीदास की नगरी से. 1995 में दिल्ली आए थे काम करने, शुरु किया एक फाइव स्टार में सिक्योरिटी कार्ड की नौकरी से, लेकिन जल्दी ही असली 'काम' शुरु कर दिया. लाजपत नगर के एक पार्लर में लग गए लेकिन 1997 में छापा पड़ा तो पकड़े गए, जिस्मफरोशी कराने के आरोप में कई महीने जेल रहे. जेल में दाढ़ी बाल बढ़ गए, लुक साधु वाला हो गया, तो फिर इसे ही बेचना शुरु कर दिया. बन गए साईं बाबा के भक्त और शुरु कर दिए प्रवचन. कुछ ही साल में मंदिर और आश्रम बनवा लिए. अब देखिए बाबा की पैठ. नॉर्थ एवेन्यू तक पहुंच गए थे बाबा के तार. 2008 में रुतबा इतना हो गया था कि सांसदों की नगरी में साईं भजन संध्या करवा दिये जहां बीजेपी नेता वी के मलहोत्रा से लेकर कीर्ति आजाद सरीखी हस्तियां शामिल हुईं. चित्रकूट के में हुए कार्यक्रम में यूपी के कई मंत्री और सांसद शामिल हुए. बाबा के धरे जाने के बाद अब सब कह रहे हैं, उन्हें बाबा के करतूतों का पता नहीं था. उनके साथ सैकड़ों लोगों को बाबा ने धोखा दिया, उनकी साईं श्रद्धा का फायदा उठाया. लेकिन जब बाबा का मुंह खुलेगा, तो कितने चेहरे लाल होंगे ये कहना अभी मुश्किल हैसवाल है कि आप बाबाओं के फेर में पड़ते क्यों हैं, अगर आप साईं के भक्त हैं, राम के भक्त हैं, और किसी फ्लाने-चिलाने के भक्त हैं तो आपको बाबाओं का जरिया क्यों चाहिए? आप नहीं जानते आपकी श्रद्दा की वजह से इन बाबाओं की ठेकेदारी कितनी बड़ी हो जाती है, कान पकड़िए, किसी बाबा के भक्त नहीं बनेंगे आप...

मंदी में महंगाई के मारे------------------

किस पर्सन में कहें- मंदी में महंगाई के ‘मारों’ की व्यथा. राह चलते एक के बाद एक मिलते जाते हैं, ‘मारे’ एक हों तो न, यूं कहें कि घर से दफ्तर तक पूरा रास्ता मंदी में महंगाई के मारों से भरा पड़ा है. इसलिए इन पर तो एक सीरीज बनती है. क्योंकि ये ‘मारे’ भी अजीब है, जो जितना ‘मारा’ है वो उतने की भरपाई में जुटा हुआ है. किसी को अंदाजा तक नहीं, कि इस मारा-मारी में ‘मार’ सब पर दुगनी पड़ रही है. शुरुआत करते हैं, सोसायटी मार्केट में कोने पर रेवड़ी की ठेली लगाने वाले से. मेवाड़ आइसक्रीम की ठेली से आप सभी परिचित होंगे- देसी आइसक्रीम के साथ बादाम मिल्क शेक परोसते हैं- फरवरी मार्च में आते हैं राजस्थान के दूर दराज के गांवों से और दीवाली तक वापस चले जाते हैं...कल अचानक दिख गई थी उसकी ठेली. मार्केट के उसी कोने पर, जहां पिछले साल लगी थी. उसे देखकर अचानक ठिठका. अरे, ये तो गंगा है, ये आ गया मतलब मार्च आ गया. पिछली दीवाली पर तो यही कह कर गया था. वक्त से हफ्ता डेढ़ हफ्ता पहले आ गया, अरे हां, आखिर फरवरी भी तो खत्म ही होने वाली है...उसे देखकर मैं मुस्कराया, उसने भी दूर से देखते सलाम किया. मैं भी दुकान पर चला गया. पिछले 2 साल से जान पहचान है. एक तरह की आत्मीयता हो गई है. 17-18 साल का लड़का है. शादी ब्याह नहीं हुआ, शहर में पिछले दो साल से आना जाना है. जितने दिन रहता है सौ-दो सौ कमा लेता है, इसी के लिए इतनी दूर से आता है, अब फरवरी में आया है, तो सीधे दीवाली पर ही जाएगा. बीच में जितनी गर्मी पड़ेगी, मेवाड़ की मलाई उतनी ही बिकेगी....हाल चाल की बात होने के बाद उसने एक ग्लास भर बादाम शेक आगे बढ़ाया- सर ये लो, मौसम का पहला ग्लास...मैंने भी ये परवाह किए बिना कि जुकाम में इतना ढंडा शेक नुकसान करेगा, चम्मच से धीरे धीरे चाटना शुर कर दिया. सोंधे दूध और देसी हाथ से बना ये शेक, कहना नहीं होगा स्वादिष्ट लगता है. कुछ देर के लिए आदमी डॉक्टरों की नसीहत भूल जाता है- ठेली वाले पानी बढ़िया यूज नहीं करते, दूध में भी मिलावट होती है, चीनी भी तीसरे चौथे दर्जे की होती है, हाईजीन के दूसरे स्टैंडर्ड भी फॉलो नहीं करते ठेली वाले, इसलिए, यहां फटकना लेकिन बीमारी, खासकर ‘इंफ्केशस डिजीज’ को दावत देना है. लेकिन ठेली वाले से इतनी आत्मीयता है कि पास जाने पर इन चीजों का ख्याल नहीं रहता. मैंने ग्लास खाली कर दस का नोट आगे किया, जैसा कि पिछले साल करता था. इस बार उसने पैसे तो लिए, लेकिन ये कहते हुए- सर, पांच रुपये और. इस साल 15 का रेट हो गया है. पांच रुपये का झटका अचानक लगा. हालांकि जल्द ही ये समझ गया कि दूध और चीनी के दाम बढ़े हैं, कीमत तो ज्यादा नहीं बढ़ाई. रहन सहन और खान पान के दूसरे खर्चे भी तो बढ़ गए हैं. ग्लास पर पांच रुपये कुछ ज्यादा नहीं...जिनको पीना होगा मेवाड़ मिल्क शेक, वो पंद्रह देंगे...वैसे देखा जाए, तो एक चीज पर एक साल में 50 परसेंट का चूना ज्यादा होता है. आदमी झेल तो लेता है, लेकिन कहीं न कहीं उसे एडजस्ट करने की सोचता है. उसकी ठेली पर से लौटते हुए मेरे भी मन में भी पांच रुपये की कचोट सी उठी- मन में डॉक्टर की दबी हुई नसीहतें याद आने लगी.हाईजीन के सवाल प्रचंड होने लगे. ‘यार इससे बढ़िया तो वो प्रो-बायोटिक मिल्क है. हाइजीनिक भी और प्योर भी. औऱ सबसे बड़ी बात आज भी बजट में है- पिछले साल भी दस में आती थी इस साल भी. ये और बात है मल्टीनेशनल कंपनी ने दाम बढ़ाने की जगह दस मिलीलीटर मात्रा कम कर दी है, लेकिन छंटाक भर कम से क्या फर्क पड़ता है. पांच का सिक्का तो बचता है.‘अगले दिन शाम को मैं फिर मार्केट की तरफ गया, उसकी रेड़ी की तरफ से भी गुजरा, लेकिन मेवाड़ मिल्क शेक की तलब जाने क्यों नहीं थी. उसने दुआ सलाम भी की, लेकिन मैं दूर से ही निकल गया. शॉपिंग के बाद जब गले में तराश का एहसास हुआ, तो मुझे उसकी ठेली याद आई, लेकिन तब तक मेरे कदम प्रो-बायोटिक मिल्क खरीदने के लिए बढ़ चुके थे. 10 रुपये में दो घूंट की शीशी लिए मैं वापस लौट रहा था. उसने मुझे आते हुए देखा लेकिन तब तक मैं शीशी खाली कर चुका था, और नजरे चुराते हुए घर को लौट रहा था. मेरी जेब में पांच रुपये ज्यादा बजे थे, लेकिन मैं सोच रहा था अगर सब ऐसे ही सोचने लगे, तो इस मेवाड़ी ठेले वाले का क्या होगा? क्या ये भी ग्लास छोटा कर दाम दस रुपये कर लेगा, या धंधा मंदा होने पर अगले साल से आना बंद कर देगा?

मरकटिया मच्छर- हंस लो धीरे धीरे - अनूप

कुत्ते नाहक ही बदनाम है अपनी टेढ़ी दुम को लेकर, इन मच्छरों की तो जात ही टेढ़ी है. जाने इन्हें कान के आस पास काटने में क्या मजा आता है. हर बार यहीं मार खाते हैं, हर बार यहीं मसले जाते हैं, लेकिन कान पर काटने से बाज नहीं आते.जाने न्यूज रुम में कहां से आ गए हैं इतने सारे लंबी टांगों वाले मरकटिया मच्छर- बेकार में ड्यूटी बढ़ाने! पेज कारे करने' के साथ हाथ भी लाल करने पड़ते हैं. क्या करें- ससुरे इतना भी नहीं समझते, आदमी के 'अंदर का शोर बाहर निकालने वाली' मशीन पर अपना राग अलापना कितना जानलेवा होता है. भगाने से भी नहीं भागते ढीठ कहीं के...घूम फिर कर कान पर मंडराने लगते हैं. समझते नहीं, एक तो 'विदाउट ब्रेक काम करो, बीच-बीच में ताली पीटते रहो. सुबह तक ढेर लग जाता है डेस्क पर. जिस दिन हाफ सेंचुरी लगाने की फुरसत नहीं लगी, उस दिन भी 20-25 मच्छरों की लाशें 'एक शिफ्ट में हुई हिंसा' का सबूत पेश कर रही होती है. उखमज कहीं के, जैसे पैदा होते हैं, वैसे ही मारे जाते हैं. लेकिन बेकार में प्रोड्यूसर को पापी बना जाते हैं. डेस्क पर खून के धब्बे देखकर मैनेजमेंट तो यही कहेगा! सफाई वाले नहीं समझ पाते, डेस्क पर इतने करीने से क्यों रखी हुई हैं मच्छरों की लाशें. इस लिहाज से कितने मूर्ख लगते हैं न्यूज रुम के मच्छर. भुक्खड़ इतने कि न सामने वाले की संवेदना का एहसास, न रीझ का, न खीझ का. इनकी चतुराई का अंदाजा इसी बात से लगाइए, कि निकलते हैं 'चिकने चुपड़े डेस्क के अंदर जमी गर्द' से, लेकिन पांव पर बैठना तक गवारा नहीं. जैसे इनकी तौहीन हो जाएगी. जान की बाजी लगाकर काटने दौड़ते हैं कान पर. एक तो जाने क्यों दफ्तर में घुसते ही कान लाल-भभूका हो जाता है (डॉक्टर बेहतर बताएंगे क्यों) दूसरे ये लगते हैं उसी पर मुंह मारने. जरा भी 'सेंस' होता, तो समझ लेते 'रिसते जख्म में सींक डालना' इंसानियत नहीं होती. खून पीना है तो 'मोटी चमड़ी वाली जगह' का पी लो यार. ये कान की जगह का पीने की कैसी लत?. ये ठीक है कि तुम्हारे पास भी 'शीशाबंद शीतल हॉल' में एक बार घुसने के बाद निकलने का चारा नहीं बचता. लेकिन ये तो समझो, तुम न्यूज रुम के मच्छर हो, किसी गंदी नाली के नहीं, तुम्हारी 'सेंसिबलिटी' तो हमसे मैच करनी चाहिए!

स्कूली जीवन - एक यादाश्त -----अनूप

स्कूली जीवन में जब अपनी कापी के पहले पन्ने में लव इज ब्लाइंड और लव इज गाॅड को पूरी कलाकारी से लिख कर ही प्रेम की सारी कलाबाजियां दिखाया करता था, तब एक मास्साब गुस्साकर कहा करते थे कि मडई दुबे बनेगा का रे! मैं नहीं जानता था कि मडई दुबे कौन हैं, न उस समय जानने की इच्छा थी. लगता था मास्साब गुस्साकर किसी गुंडे-मवाली से मेरी तुलना करते होंगे, इतनी हिम्मत भी नहीं थी कि उनसे पूछता कि किससे तुलना करते हैं मेरी ओर कौन हैं मडइ्र्र दुंबे जो ‘लव’ षब्द देखते ही आपको याद आने लगते हैं. एक बार उत्सुकता से पूछ ही लिया मास्साब से. जरा बताइये कि इ मडई दुबे कौन हैं? तब उन्होंने डांटते हुए इतना ही कहा था कि जो जानना और पढना है, वह तो कभी नहीं पूछते हो. सुनो-मडई दुबे पंडीजी थे आरा के. डोमिन से बियाह कर लिये थे. खैर! समय बितता गया और मैं प्रेम का जुनून, प्रेम की पूजा, प्रेम का उत्सर्ग, प्रेम का मतलब अंगरेजी के इन्हीं दोनों वाक्यों से जानता रहा. हाई स्कूल में पहंुचा तो किसी ने अंगरेजी का एक नया वाक्य भी बता दिया- लव बीगेटस लव!उन्हीं दिनों एक भोजपुरी फिल्म भी देखने का मौका मिला था- पिरितिया के खेल. तब पिरितिया का कौन सा खेल सिनेमा हाॅल में चला था, तब जरा भी समझ में नहीं आया था. हां, हाॅल में लोग जोर-जोर से ताली बजा रहे थे, आगे बइठे हुए लोग लाॅटरी उडा रहे थे, सिटी बजा रहे थे परदा के सामने, यह जरूर याद था.लेकिन पिछले दिनों उस सिनेमा की याद एकबारगी से आ गयी. आरा-छपरा के इलाके में जाना हुआ था. छपरा में कुछ लोगों ने महेंदर मिसिर और ढेलाबाई की प्रेम कथा को सुनाया लेकिन दिल खोल कर नहीं. ऐसे बता रहे थे, जैसे महेंदर मिसिर कउनो बहुत बडा अपराध कर दिये थे. लेकिन उसी छपरा में मडई दुबे का नाम फिर सुनने को मिला. लोगों ने बताया कि अजी प्यारे के कहानी जाने के बा त मडई बाबा के जानीं. उहो एगो गजबे के प्रेमी भइलन. मडई दुबे का नाम सुनते ही मास्साब की याद आ गयी.छपरा रूकना नहीं हो सका था, सो सिर्फ इतना ही जान कर रह गया कि मडई बाबा के प्रेम कहानी लोकमानस में रचा-बसा है. आरा आया तो सबसे पहले लोक मानस में मडई दुबे को ही तलाषना षुरू किया. कुछ ने नाक-भौं सिकोडे लेकिन अधिकतर ने गर्व से, एक रिदम के साथ, संवाद में भी आरोह-अवरोह का ध्यान रखते हुए बताया-सुनाया. कुछ ने तो चटखारे भी लिये.लेकमानस में जो कहानी रची बसी है और जो सुनाया गया, उसका साार यह है कि मडई दुबे आरा के सलेमपुर गांव के रहने वाले थे. इलाके के नामी पहलवान. गष्हस्थ परिवार से ताल्लुक रखते थे. मडई दुबे अपने गांव के पास ही गंगा किनारे रोज जाया करते थे. कुछ ने बताया खेत-बधार देखने तो कुछ ने बताया कि नहीं गाय चराने. खैर! कम जो भी करने जाते हैं, उससे उनके व्यक्तित्व पर कोई फर्क नहीं पडता. वहीं गंगा किनारे एक डोम का परिवार बसा हुआ था. उसकी झोपडी वहीं थी. डोम परिवार की ही सदस्य थी- सुगमोना. सुंदर युवती. पता नहीं देखते-देखते कब मडई दुबे का दिल सुगमोना पर आ गया और सुगमोना को भी मडई को एक बार रोज-ब-रोज भर नजर देखना जीवन की जरूरतों में षामिल हो गया. रोज ब रोज लुक-छिपा के देखा-देखी की आदत, बतकही में बदल गयी. मडई दुबे हर दिन कोई न कोई ऐसा अवसर जरूर निकाल लेते कि सुगमोना से उनकी बातचीत हो जाये और जैसे सुगमोना भी उस अवसर का इंतजार ही करती रहती थी. यह बात धीरे-धीरे गांव में फैल चुकी थी. मडई गांव के जिस गली से गुजरते-टोंटबाजी होती- जा ए मडई, तोके अउरो कोई ना मिल. नामें हंसावत बाड.मडई पर इन सभी बातों का कोई असर नहीं पडता. तब गांव वालों ने धमकी दी कि डोमिनिया से मिलल, ओकरा से बोलल बतियावल छोड द, ना तो गांव और जाति, दुनों से निकाल देबल जाई. मडई अपनी धुन में थे, यह धमकी भी बेअसर. जब कोई बहुत छेडे तो मडई बस इतना ही कहते- हमार बात क ेले के गांव काहे परेषान बा और जेकरा जे करेके बा, करे, अब हमार जीवनसंगीनी तो सुगमोनवा ही बनीे. मडई दुबे पर जब बातों का असर नहीं हुआ तो गांव की पंचायत बैठी और फैसला सुनाया गया- मडई को गांव और जाति दुनों से बेदखल किया जाये. फैसले के पहले ही मडई गांव छोड कर सुगमोनाकी झोपडी में रहने चले गये थे. और उस पंचायत मेंसुगमोना के साथ यही कह गये कि तु लोग का निकलब जा गांव से, जाति से- हम खुदे ना रहल चाहब अइसन जानवरन के बीच में, कुजातन के बीच में-जेकरा दिल में प्यार खातीर कउनो जगहे नइखे.लोग बताते हैं कि बहुत दिनों तक उसी झोपडी में गांव छोडकर मडई दुबे सुगमोना के साथ रहते रहें. गांव वालों द्वारा प्रताडना का दौर तब भी नहंी थमा तो वे सदा के लिए वह गंगा तट छोड कर गजराजगंज में रहने आ गये. फिर क्या हुआ? आगे और जानने की इच्छा थी. बताया गया कि मडई और सुगमोना का आल-औलाद हुआ. तो अब कहां है आल औलाद? किसी ने बताया- अब का बात पूछ रहे हैं- बहुत बडा आदमी बन गया है उनका वंषज. बढका बिजनेसमैन. मैंने पूछा कि अउर कुछ बताइये मडई दुबे के बारे में? किसी ने कहा कि एतना पूछ रहे हैं तो काहे नहीं एक बार पिरितिया के खेल सिनेमा देख लेते हैं. उनही पर तो बना था. मुझे अचानक से याद आ गया वह दिन जब मैं सिनेमा हाॅल में उस फिलिम को देखने गया था लेकिन कहानी याद ही नहीं आ रही थी. लेकिन गंगा, गंगा किनारे वह झोपडी, वह पहलवान जैसा एक हीरो, एक सुंदर हिरोइन हल्की-हल्की याद आने लगी. मैंने आखिरी सवाल पूछा आरा के उस चैपाल में. इ कब के बात है. कब हुए थे मडई दुबे. अपने अंदाज में बताये एक सज्जन- कब का कउनो इ सैकडा बरिस पुराना बात है. अभिये, एही सदी के बात है- हो रहा होगा 70-80 साल. अभिये हाले बरिस में तो दुनिया से विदा हुए हैं मडई बाबा.मैंने एक सवाल और पूछ लिया- मडई नामे था का उनका?जवाब मिला- अब इ तो नहीं बता सकते हैं. हो सकता है सुगमोना के मडई में रहने चले आये हों सब छोड छाड के, एह से भी नाम पड गया हो. इ तो सलेमपुरे में सही-सही पता चलेगा. किसी ने इस प्रेम कहानी में एक और नयी चैपाली टूनकी मारी- कहानी तो एगो अउर है उनक रनाम के पीछे. हम तो इ भी सुने हैं कि जब मडई दुबे सब छोड छाड के सुगमोना के साथ गंगा किनारे रहने लगे तो गांव वालों ने फिर एक फरमान सुनाया कि अगर इहां रहना है और मडई के सच्चो में एतना प्रेम है सुगमोना से तो उ मडई पर चढ के पेषाब करेगी अउर मडई दुबे को नीचे खड हो के उसे पीना होगा. बताते हंै कि प्रित के परीक्षा की बारी आयी तो मडई दुबे और सुगमोना उसके लिए भी तैयार हो गये थे. लेकिन प्रताडना से तंग आकर और प्रेम को पहरेदारी से मुक्त करने के लिए आखिर में उन्होंने वह इलाका छोड देने का ही फैसला किया.मैं मडई दुबे के बारे में और जानकारी लेने सलेमपुर नहीं जा सका लेकिन उस एक प्रेम का मानस पर प्रभाव आरा-छपरा के इलाके में ही महसूस कर आया. उसी प्रेम पर, जो कभी कलंक बांेध सा लगा था, अब गर्व की बात है. आरा से आते समय स्कूल के मास्साब भी याद आये. मैं खुद से ही संवाद करता रहा कि मास्साब गुस्से में भी कोई गलत उपमा नहीं देते थे

जिस्मानी रिश्ते कायम कर रहे दो व्यक्तियों का स्टिंग-एक रिपोर्ट अब्दुल्ला की

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से करीब 7 महीने पहले जोरशोर से शुरू हुआ न्यूज चैनल 'वायस आफ नेशन' उर्फ 'वीओएन' आजकल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रीडर. डा. एसआर सीरस की मौत की वजह से कुख्याति हासिल कर रहा है. इसी चैनल के जर्नलिस्टों ने डा. सीरस के घर में जबरन घुसकर सेक्स स्टिंग किया और उस स्टिंग को इस चैनल के आकाओं ने बिना सोचे-विचारे, बिना जांचे-परखे प्रसारित भी कर दिया. यह कारनामा करने वाले 'वीओएन' के चैनल हेड जे. थामस हैं जो 14 वर्षों से मीडिया में हैं और ज्यादातर वक्त छुटभैय्ये चैनलों में बिताया.
थामस के अतीत के बारे में पता किया गया तो मालूम चला कि वह पीबीसी टीवी, पटियाला टीवी, टीवी100, जैन टीवी जैसे चैनलों में काम करते रहे हैं. बताया जा रहा है कि वीओएन चैनल हेड जे. थामस को बिजनेस टारगेट भी दिया गया है जिसे वे पूरा नहीं कर पा रहे हैं और इसी कारण चैनल में कई तरह की गड़बड़ियां शुरू हो गई हैं. आंतरिक गुटबाजी ने इस चैनल की हालत और खराब कर रखी है. सेक्स स्टिंग दिखाने के मामले में चैनल का नाम उछलने के बाद बवाल शुरू हो गया है. चैनल के लोग एक दूसरे के सिर पर इसका ठीकरा फोड़ने में लगे हैं.
सूत्रों के मुताबिक हाल ही में चैनल के आउटपुट हेड श्रीनिवास पंत अपनी टीम के साथ चैनल छोड़ कर चले गए. साथ ही बिजनेस डेस्क हेड सुदेश कुमार भी चैनल से किनारा कर श्रीनिवास और उनकी टीम के साथ देहरादून से जल्द ही शुरू होने वाले एक दूसरे न्यूज़ चैनल में चले गए हैं. इनके अलावा एचआर के सुमित प्रताप सिंह, क्राइम हेड संजीव शर्मा, प्रोड्यूसर प्रदीप थलवाल, प्रोग्राम प्रोड्यूसर दिलीप मिश्रा, सारंग जोशी, पूनम पाल, भारती शर्मा, एंकर मनु शर्मा, रिपोर्टर रॉबिन चौहान, शेलैन्द्र पांडे, ग्राफिक्स डिजाइनर राजेश नागवंशी, कैमरामैन दिनेश रतूड़ी, बिजेन्द्र रतूड़ी, यशपाल सैनी, राहुल शर्मा, विनोद धीमान एडिटर सुशील, आनंद, पुष्पांक आईटी से कपिल परमार, दीपक भट्ट, भरत कुमार समेत करीब 30 लोग चैनल छोड़ कर जा चुके हैं.
सबसे दुर्भाग्य की बात ये है कि चैनल हेड की सहमति से चैनल के मालिक ने यहां कार्यरत कर्मियों के वेतन में 25% की कटौती कर दी है. इसके बाद से कर्मियों में कायम असंतोष और भड़क उठा है. दूसरी ओर चैनल छोड़कर जा चुके कई लोग अपनी फंसी हुई सेलरी वसूलने के लिए कानूनी कार्रवाई तक करने का मन बना रहे हैं. सूत्रों के अनुसार चैनल हेड जे. थोमस अपना बिजनेस टारगेट पूरा नहीं कर पा रहे हैं, जिस कारण चैनल की आर्थिक स्थिति लगातार खराब होती जा रही है. खबर यह भी है कि चैनल मालिक मनीष वर्मा ने चैनल हेड जे. थोमस को बिजनेस टारगेट पूरा करने को लेकर अल्टीमेटम भी दे दिया है. चैनल मालिक मनीष वर्मा ने देहरादून से राष्ट्रीय चैनल शुरू कर यह मिथक तोड़ने की कोशिश की थी कि एनसीआर से अलग हटकर भी राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल चलाया जा सकता है, लेकिन चैनल की वर्तमान हालत देखकर यह कहना मुश्किल ही है कि यह चैनल अब और कितने दिन चल पाएगा.
इस पूरे प्रकरण पर जे। थामस ने बताया कि उन लोगों ने डा। सीरस प्रकरण में कुछ भी गलत और आपत्तिजनक नहीं दिखाया. जो कुछ भी दिखाया गया वह कतई गैर-कानूनी या अनैतिक नहीं था. इस खबर में डा. सीरस की बाइट भी प्रसारित की गई. थामस ने खुद को बिजनेस टारगेट दिए जाने के आरोप से भी इनकार किया.
दो व्यक्ति अपने घर में आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाते हैं, समलैंगिक संबंध बनाते हैं, 'गे' रिलेशनशिप रखते हैं और मीडिया वालों को इसकी भनक लग जाती है तो सोचिए क्या होगा! कम से कम जितने बुद्धिविहीन मीडियावाले होंगे, वे तुरंत अपने तामझाम के साथ मौके पर पहुंच जाएंगे और स्टिंग आपरेशन करना शुरू कर देंगे. ऐसा ही हुआ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के माडर्न लैंग्वेज डिपार्टमेंट के रीडर डा. श्रीनिवास रामचंद्र सीरस के मामले में. मीडिया वालों को इतनी भी अकल नहीं आई कि दो लोगों के बीच का बिलकुल निजी मामला मानकर इन्हें बख्श दें. मीडिया वाले चल दिए स्टिंग करने. बिना अनुमति दूसरे के घर में घुस गए. जहां कहीं से भी अंदर का दृश्य दिख रहा था, वहां से लगे शूट करने. और तैयार कर लिया एक स्टिंग आपरेशन.
नतीजा यह कि डा. सीरस की निजी जिंदगी सार्वजनिक उपहास का विषय बन गई और डा. सीरस को कई तरह की यातना-प्रताड़ना झेलते हुए इस दुनिया से विदा होना पड़ा है. डा. एसआर सीरस अब इस दुनिया में नहीं हैं. कोई कह रहा है कि खुदकुशी कर ली तो कोई कह रहा है कि जहर देकर जान ली गई है. इनकी मौत के बाद जब पुलिस सक्रिय हुई है तो कई किस्से निकलकर सामने आ रहे हैं. फिलहाल तो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के रीडर डॉक्टर एसआर सीरस के मामले में यूनिवर्सिटी के चार प्रोफेसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर लिया गया है. इसके अलावा उन तीन मीडियाकर्मियों के खिलाफ भी मामला दर्ज कर लिया गया है जिन्होंने डा. सीरस के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन किया था. इन मीडियाकर्मियों के नाम हैं सैय्यद आदिल मुर्तजा, आशू और कैमरामैन सिराज.
ये तीनों वायस आफ नेशनल चैनल के हैं. यह चैनल देहरादून से संचालित होता है. स्टिंग के समय आदिल मुर्तजा टीवी100 में काम करता था. इन लोगों के खिलाफ अलीगढ़ के सिविल लाइन थाने में धारा 147, 347, 352, 355, 452, 454, 455, 457, 458, 506, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है. सूत्रों के मुताबिक तीनों मीडियाकर्मियों द्वारा स्टिंग किए जाने के बारे में डा. सीरस को पता चल गया था. उन्होंने इन लोगों के हाथ पैर जोड़े. पर इन मीडियाकर्मियों का दिल नहीं पसीजा. इन्होंने स्टिंग के फुटेज को अपने चैनल के पास भेज दिया. वायस आफ नेशन में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत पत्रकारों को भी इतनी अक्ल नहीं थी कि वे दो लोगों के बीच उनकी सहमति से उनके घर में घटित हुए सेक्सुवल रिलेशन की तस्वीरें दिखाने से मना कर देते. इन पत्रकारों ने स्टिंग को चैनल पर प्रसारित कर दिया.
बताया जाता है कि स्टिंग में डा. सीरस के साथ दूसरा व्यक्ति रिक्शावाला था. डा. सीरस रिक्शेवाले को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय परिसर स्थित अपने कमरे में ले गए थे. दोनों ने अपनी मर्जी से जिस्मानी रिश्ते बनाए. इसकी भनक इन तीनों मीडियाकर्मियों को लगी तो इन्होंने चुपचाप डा. सीरस के घर में प्रवेश कर पूरे दृश्य का फिल्मांकन कर लिया. बताया जाता है कि इन मीडियाकर्मियों ने विश्वविद्यालय के पीआरओ, प्राक्टर, मीडिया प्रभारी समेत कई लोगों को स्टिंग के विजुवल दिखाए. इन मीडियाकर्मियों और विश्वविद्यालय के आरोपी अधिकारियों के बीच सांठगांठ होने की बात भी चर्चा में है. स्टिंग के चैनल पर प्रसारित हो जाने के बाद से डा. सीरस कैंपस में विश्वविद्यालय अधिकारियों के बीच हंसी और उपहास के पात्र बन गए थे. उन्हें बिना जांच ही सस्पेंड करा दिया गया. उनसे उनका परिसर स्थित कमरा खाली करा लिया गया.
डा. सीरस की मौत के बाद अब उन लोगों की भी पोल खुलने लगी है जिन्होंने उनके साथ खिलवाड़ करने की कोशिश की. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के रीडर डॉक्टर सीरास को जो इंसाफ उनके जीते जी नहीं मिला वो शायद अब मिल जाए. सीरस पर समलैंगिक होने का आरोप लगाकर उनका स्टिंग ऑपरेशन करने वालों पर कानून का शिकंजा कसता जा रहा है. सीजेएम कोर्ट के आदेश के बाद यूनिवर्सिटी के चार प्रोफेसरों और स्टिंग ऑपरेशन करने वाले 3 मीडियाकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर लिया गया है.
वैसे मौत के बाद भी रीडर सीरस के साथ यूनिवर्सिटी में फर्जीवाड़े का खेल चल रहा है. डा. सीरस के खिलाफ समलैंगिकता के आरोपों के बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने तो सस्पेंड कर दिया लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के बहाली आदेश के बावजूद उन्हें वापस बहाल नहीं किया गया. हाईकोर्ट के बहाली आदेश की कॉपी अब डा. सीरस की मौत के बाद भेजी गई है. हालांकि यूनिवर्सिटी के पीआरओ के मुताबिक आदेश के साथ ही कई दिन पहले ही उनका निलंबन रद्द कर दिया गया था. यूनिवर्सिटी में चेयरमैन और पीआरओ के अलग-अलग बयान से अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह से सीरस के साथ खिलवाड़ किया जा रहा था. सीरस की मौत पर भी सवाल उठ रहे हैं. अब तक साफ नहीं हो पाया है कि सीरस ने खुदकुशी की है या फिर उनकी हत्या हुई है. साफ है कि रीडर सीरस के साथ जिस तरह का बर्ताव किया गया कहीं न कहीं उनकी मौत के लिए यूनिवर्सिटी प्रशासन भी जिम्मेदार है.
ज्ञात हो कि डॉक्टर सीरस की मौत का पता तब चला जब उनके मकान से बदबू आनी शुरू हुई. सीरस कुछ ही दिन पहले सस्पेंड किए जाने के कारण यूनिवर्सिटी के मकान को खाली करने के बाद नई जगह शिफ्ट हुए थे. डा. सीरस की मौत के बाद कई सवाल उठ खड़े हुए हैं जिनका जवाब आपको और हमको देना पड़ेगा--
अगर डा. सीरस गे उर्फ समलैंगिक थे तो क्या उन्हें समाज में इज्जत से जीने का हक नहीं था?
गे या समलैंगिक होना कोई गुनाह तो नहीं, फिर क्यों बार-बार ऐसे लोगों को समाज दुत्कार देता है?
अपनी मर्जी से अपने घर में समलैंगिक रिश्ते बनाने वाले कानून अपने हाथ में नहीं ले रहे, फिर इनसे अपराधियों सा बर्ताव क्यों?
मीडिया के लोग अपने घरों में अपनी पत्नियों के साथ खुद के रिलेशन के दृश्य को नहीं फिल्माते तो दूसरे के घर में क्यों घुसपैठ?
जो मीडियाकर्मी दूसरे के अंतरंग जीवन में दखल दे, उनके खिलाफ क्यों न कठोर कार्रवाई का प्रावधान किया जाए?

इनकी पुरी पहचान - अब्दुल्ला

नवाब साहब , उम्र 70 बरस, पता-कश्मीरी मोहल्ला, लखनऊ। लेकिन यह उनकी पूरी पहचान नहीं है। असल पहचान को जिंदा बनाए रखने के लिए इस बुजुर्ग को कितने पापड़ बेलने पड़ रहे हैं, जरा उस पर नजर डालिए। नवाब मियां सैयद नकी रजा अवध की बहू बेगम के वंशज है। उन्हें वसीका मिलता है। नवाब साहब लखनऊ के जिस मोहल्ले में रहते हैं, वहां से हुसैनाबाद वसीका दफ्तर तक पहुंचने का रिक्शे का किराया 25 रुपये है। यानि जिस दिन वह वसीका लेने को घर से निकलते हैं उन्हें रिक्शे से आने जाने के लिए पचास रुपये खर्च करने पड़ जाते हैं। इस उम्र में आने-जाने और दफ्तर में लगने वाला वक्त भी कितना तकलीफ देह होता होगा, उसे भी आसानी से समझा जा सकता है। लेकिन नवाब साहब को वसीका कितना मिलता है, यह सुनकर आप चौक जाएंगे। सिर्फ दो रुपये 98 पैसे महीने! दो रुपये 98 पैसे हासिल करने को आप पचास रुपये रिक्शे के किराए में ही खर्च कर देते हो, आने-जाने की जहमत अलग से, यह सवाल सुनकर नवाब साहब नाराज हो जाते हैं, कहते हैं-''तो क्या मैं अपनी पहचान को भी खत्म कर दूं? अपनी पहचान का यही तो एक दस्तावेजी सबूत है, वर्ना एक अरब की आबादी वाले इस मुल्क में कौन यकीन करेगा कि यह बूढ़ा बहू बेगम का वंशज है। मैं अपनी तकलीफ, आराम के लिए अपनी आने वाली नस्लों से भी ना इंसाफी नहीं कर सकता। आखिर उनकी पहचान भी तो खत्म हो जाएगी। अपने जीते जी, मैं ऐसे नहीं होने दूंगा।'' अपनी पहचान को जिंदा बनाए रखने के लिए जिद्दोजहद करने वाले नवाब मियां सैयद नकी रजा अकेले नहीं है। अवध के शासकों के यही कोई 1700 वशंज इस तरह की जिद्दोजहद में शामिल हैं। इन सभी को वसीका मिल रहा है लेकिन यह रकम एक रुपये, दो रुपये, पांच रुपये, दस रुपये बीस रुपये है। बस कुछ ही खुश किस्मत हैं, जिन्हें मिलने वाला वसीका चार सौ या पांच सौ रुपये है। अवध के शासकों के इन वंशजों के लिए रकम उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, जितना इसके जरिए अपनी पहचान को जिंदा रखना है। शायद यही वजह है कि जो रकम सुनने में बहुत मामूली लगती है, उसे हासिल करने के लिए होने वाली जहमत उनके लिए कोई मायने नहीं रखती है।

मुलाकात चलते चलते पीयूष मिश्र से ---अब्दुल्ला अनूप

पीयूष मिश्रा से मेरी मुलाकात अनुराग कश्यप की वजह से हुई। पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक ‘स्केलेटन वुमन’ था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए। मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि
आपका इंटरव्यू कर सकता हूं एक हिंदी ब्लॉग के लिए – साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी।
उन्होंने ज़्यादा सोचे बिना कहा – परसों आ जाओ, यहीं, मानव (कौल) का प्ले है, उससे पहले मिल लो। बातचीत बहुत लंबी नहीं हुई पर पीयूष जितना तेज़ बोलते हैं, उस हिसाब से बहुत छोटी भी नहीं रही। उनके गीतों का रेस्टलेसनेस उनके लहज़े में भी दिखा और उनके लफ्ज़ों में भी। ये तो नहीं कहा जा सकता कि वो पूरे इंटरव्यू में ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ रहे पर कुछ जगहों पर कोशिश ज़रूर नज़र आयी। पर बातचीत का अंतिम चरण आते आते उन्होंने खुद को बह जाने दिया और थियेटर-वाले पाले से भी बात की, जबकि बाकी के ज़्यादातर सवालों में वो यही यकीन दिलाते दिखे कि अब पाला बदल चुका है।
लिखित इंटरव्यू में वीडियो रिकार्डेड बातचीत के ज़रूरी सवालों का जोड़ है, पर पूरा सुनना हो तो वीडियो ही देखें। पृथ्वी थियेटर की बाकी टेबलों पर चल रही बहस और बगल में पाव-भाजी बनाते भाई साब की बदौलत कुछ जगहों पर आवाज़ साफ नहीं है। ऐसे ‘गुम’ हो गए शब्दों का अंदाज़न एवज दे दिया है, या खाली डॉट्स लगा दिए हैं। मैं थोड़ा नरवस था, और कुछ जगहों पर शायद सवालों को सही माप में पूछ भी नहीं पाया, पर शुक्रिया पीयूष भाई का कि उन्होंने भाव भी समझा और विस्तार में जवाब भी दिया।
आपका अब भी लेफ्ट विचारधारा से जुड़ाव है?
(लेफ्टिस्ट होने का मतलब ये नहीं कि) परिवार के लिए कम्प्लीटली गैर-ज़िम्मेदार हो जाओ।
लेफ्ट बहुत अच्छा है एक उमर तक… उसके बाद में लेफ्ट आपको… या तो आप लेफ्टिस्ट हो जाओ… लेफ्टिस्ट वाली पार्टी में मिल जाओ… तब आप बहुत सुखी… (तब) लेफ्ट आपके जीवन का ज़रिया बन सकता है।
और अगर आप लेफ्ट आइडियॉलजी के मारे हो… तो प्रॉब्लम यह है कि आप देखिए कि आप किसका भला कर रहे हो? सोसाइटी का भला नहीं कर सकते, एक हद से आगे। सोसाइटी को हमारी ज़रूरत नहीं है। कभी भी नहीं थी। आज मैं पीछे मुड़ के देखता हूं तो लगता है कि (लेफ्ट के शुरुआती दिनों में भी) ज़िंदा रहने के लिए, फ्रेश बने रहने के लिए, एक्टिव रहने के लिए (ही) किया था तब… बोलते तब भी थे की ज़माने के लिए सोसाइटी के लिए किया है।
तो अब पॉलिटिक्स से आपका उतना लेना देना नहीं है?
पॉलिटिक्स से लेना देना मेरा… तब भी अंडरस्टैंडिंग इतनी ही थी। मैं एक आम आदमी हूं, एक पॉलिटिकल कॉमेंटेटर नहीं हूं कि आज (…..) आई विल बी ए फूल टू से दैट आई नो सम थिंग! पहले भी यही था… हां लेकिन यह था कि जागरूक थे। एज़ पीयूष मिश्रा, एज़ अन आर्टिस्ट उतना ही कल था जितना कि आज हूं। (अचानक से जोड़ते हैं) पॉलिटिक्स है तो गुलाल में!
हां लेकिन जो लोग ‘एक्ट वन’ को जानते हैं, उनका भी यह कहना है कि ‘एक्ट वन’ में जितना उग्र-वामपंथ निकल के सामने आता था, ‘एक्ट वन’ की एक फिलॉसफी रहती थी कि थियेटर और पॉलिटिक्स अलग नहीं हैं, दोनों एक ही चीज़ का ज़रिया हैं।
ठीक है, वो ‘एक्ट वन’ हो गया। ‘एक्ट वन’ ने बहुत कुछ सिखाया। ‘एक्ट वन’ (की) ‘सो कॉल्ड’ उग्र-वामपंथी पॉलिसी ने बहुत कुछ दिया है मुझको। (लेकिन) उससे मन का चैन चला गया। ‘एक्ट वन’ ने (जीना) सिखाया… ‘एक्ट वन’ की जो ‘सो-कॉल्ड’ उग्र-वामपंथी पॉलिटिक्स है, यह, मेरा ऐसा मानना है की इनमें से अधिकतर लोग जो हैं तले के नीचे मखमल के गद्दे लगाकर पैदा होते हैं। वही लोग जो हैं वामपंथ में बहुत आगे बढ़ते हैं। अदरवाइज़ कोई, कभी कभार, कुछ नशे के दौर में आ गया। (कोई) मारा गया सिवान में! अब सिवान कहां पर है, लोगों से पूछ रहे हैं… सफ़दर हाशमी मारा जाता है, तहलका मच जाता है, ट्रस्ट बन जाते हैं, न मालूम कौन कौन, (जो) जानता नहीं है सफ़दर को, वो जुड़ जाता है और वहाँ पर मंडी हाउस में… फोटो छप रहे हैं, यह है, वो है… सहमत! चंद्रशेखर को याद करने के लिए पहले तो नक़्शे में सिवान को देखना पड़ेगा, है कहां सिवान? कौन सा सिवान? कैसा सिवान? कौन सा चंद्रशेखर? सफ़दर के नाम से जुड़ने के लिए ऐसे लोग आ जाते हैं, जो जानते नहीं थे सफ़दर को… सफ़दर का काम, सफ़दर का काम… क्या है सफदर का काम? मैं उनकी (सफ़दर की) इन्सल्ट नहीं कर रहा… ऐसे ऐसे काम कर के गए हैं कि कुछ कहने की… खामोशी की मौत मरे हैं। मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता! थियेटर वाले की जवानी बहुत खूबसूरत हो सकती है, थियेटर वाले का बुढ़ापा, हिन्दुस्तान में कम से कम, मैं नहीं समझता कि कोई अच्छी संभावना है।
अधिकतर लोग सीनाइल (सठिया) हो जाते हैं। अचीवमेंट के तौर पर क्या? कुछ तारीखें, कुछ बहुत बढ़िया इश्यूस भी आ गये… कर तो लिया यार… अब कब तक जाओगे चाटोगे उसको? चार साल पहले जब मैं दिल्ली जाया करता था तो मेरा मोह छूटता नहीं था, मैं जाया करता था वहां पर जहां मैं रिहर्सल करता था… शक्ति स्कूल या विवेकानंद। ज़िंदगी बदल गयी यार, दैट टाइम इज़ गॉन! अच्छा टाइम था, बहुत कुछ सिखाया है, बहुत कुछ दिया है, इस तरह मोह नहीं पालना चाहिए।
एनके शर्मा जी अभी भी वहीं हैं, उनके साथ के लोग एक-एक कर के यहां आते रहे… मनोज बाजपाई, दीपक डोबरियाल। उनका क्या व्यू है? थियेटर से निकलकर आप लोग सिनिमा में आ रहे हैं?
एनके शर्मा जी का व्यू अब आप एनके शर्मा से ही पूछो। उनका ना तो मैं स्पोक्स मैन हूं… उनसे ही पूछो!
बॉम्बे में एक ऑरा है उनको लेकर… वो लोगों (एक्टर्स) को बनाते हैं।
टॉक टू हिम… टॉक टू हिम!
आप खुद को पहले कवि मानते हैं या एक्टर?
ऐसा कुछ नहीं है।
बॉम्बे में आप खुद को आउट-साइडर मानते हैं?
कैसे मानूंगा? मेरी जगह है यह। मेरा बच्चा यहां पैदा हुआ है। कैसे मानूंगा मैं?
लेकिन आउटसाइडर इन द सेन्स, मैं प्रोफेशनली आउटसाइडर की बात कर रहा हूं। जिसमें थियेटर वालों को हमेशा थोड़ा सा सौतेला व्यवहार दिया जाता है यहां पर।
नहीं नहीं। उल्टा है भाई! थियेटर वालों को बल्कि…
स्टार सिस्टम ने कभी थियेटर वालों को वो इज़्ज़त नहीं दी…
हां… स्टार सिस्टम है। स्टार सिस्टम की ज़रूरत है। थियेटर वालों को मालूम ही नहीं कि बुनियादी ढांचा कैसे होता है। मैं तो बड़ा सोचता रहा कि खूबसूरत बंदे क्यूं थियेटर पैदा नहीं कर पाया। मैं समझ ही नहीं पाया आज तक! थियेटर वाले होते हैं, मेरे जैसी शकल सूरत होती है उनकी टेढ़ी-मेढ़ी सी।
लेकिन ऐसा कुछ नहीं है… आज… नसीर हैं, ओम पुरी हैं… दे आर रेकग्नाइज़्ड। अनुपम खेर हैं…
नहीं, वह बात है कि उनको इज़्ज़त ज़रूर मिलती है लेकिन उनको इज़्ज़त दे कर पेडेस्टल पे रख दिया जाता है, लेकिन उससे आगे बढ़ने की कभी भी शायद…
आगे बढ़ने की सबकी अपनी अपनी क़ाबिलियत है। और जितना आगे बढ़ना था, जितना सोच के नहीं आये थे, उससे आगे बढ़े ये लोग। पैसे से लेकर नाम तक। इससे बेहतर क्या लोगे आप।
पुराने दिनों के बारे में, ख़ास कर के ‘एन ईवनिंग विद पीयूष मिश्रा’ होता था…
तीन प्लेज़ थे एक-एक घंटे के। पहला ’दूसरी दुनिया’ था निर्मल वर्मा साब का, दूसरा ’वॉटेवर हैपंड टू बेट्टी लेमन’ (अरनॉल्ड वास्कर का), तीसरा विजयदान देथा का ‘दुविधा’। तब पैसे नहीं थे, प्लेटफॉर्म था नहीं… आउट ऑफ रेस्टलेसनेस किया था। वह फॉर्म बन गया भई कि नया फॉर्म बनाया है। फॉर्म-वार्म कुछ नहीं था। ‘एक्ट वन’ मैंने जब छोड़ा था ‘95 में, ऑलमोस्ट मुझे लगा था की मैं ख़तम हो गया। ‘एक्ट वन’ वाज़ मोर लाइक ए फैमिली। और वहां से निकलने के बाद यह नयी चीज़ आयी।
(असली सवाल पर आते हुए) मेरे लिए ज़्यादा फैसिनेटिंग यह था कि उसकी ब्रान्डिंग, सेलिंग पॉइंट था आपका नाम। 1996 में दिल्ली में आपके नाम से प्ले चल रहा था, कहानियों के नाम से या लेखक के नाम से या नाटक के नाम से नहीं, आपके नाम से परफॉर्मेन्स हो रही थी। बॉम्बे ने अब जा कर रेकग्नाइज़ किया है…
‘झूम बराबर झूम’ में काम किया, वो चल नहीं पायी। ‘मक़बूल’ में काम किया, उसका ज़्यादा श्रेय पंकज कपूर और इरफ़ान को मिला… वो भी अच्छे एक्टर हैं… पर पता नहीं कुछ कारणों से, ‘मक़बूल’ में बहुत तारीफ़ के बावजूद रेकग्निशन नहीं मिला। ‘आजा नच ले’ में काम किया, उसका लास्ट का ओपेरा लिखा… ऐसा हुआ कि बस यह फिल्म (गुलाल) बड़ी ब्लेसिंग बन कर आयी मुझ पर। जितना काम था, सब एक साथ निकालो। लोग रेस्पेक्ट करते थे… जानते थे भाई यह हैं पीयूष मिश्रा। लेकिन ऐसा कुछ हो जाएगा, यह नहीं सोचा था।
गुलाल की बात करें तो… उसमें यह दुनिया अगर मिल भी जाए है, बिस्मिल की नज़्म है, कुछ पुराने गानों में भी री-इंटरप्रेटेशन किया है. इस सब के बीच आप मौलिकता किसे मानते हैं?
नहीं – यह नयी ही पोएट्री है।एक लाइन ली है… एक लाइन के बाद तो हमने सारा का सारा री-क्रिएट किया है। जितनी यह बातें हैं… वो आज की जेनरेशन की ज़ुबान बदल चुकी है। और आप उन्हें दोष भी नहीं दे सकते। अब नहीं है तो नहीं है, क्या करें। लेकिन उसी का सब-टेक्स्ट आज की जेनरेशन को आप कम्‍युनिकेट करना चाहें, कि कहा बिस्मिल ने था… ऐसा कुछ कहा था – कम्‍युनिकेशन के लिए फिर प्यूरिस्ट होने की ज़रूरत नहीं है आपको कि बहुत ऐसी बात करें कि नहीं यार जैसा लिखा गया है वैसा। और ऐसा नहीं है कि उनको मीनिंग दिया गया है।
फिर भी, मौलिकता का जो सवाल है, फिल्म इंडस्ट्री में बार बार उठता है। संगीत को लेकर, कहानियों को लेकर, उस पर आपका क्या टेक है?
मालूम नहीं… इंस्पिरेशन के नाम पर यहाँ पूरा टीप देते हैं. सारा का सारा, पूरा मार लेते हैं.
आपके ही नाटक ‘गगन दमामा बाज्यो’ पर ‘लेजेंड ऑफ भगत सिंह’ बनाया गया। वहां मौलिकता को लेकर दूसरी तरह का डिबेट था।
वहां पर जो है की फिर यू हैव टू बी रियल प्रोफेशनल. बॉम्बे का प्रोफेशनल! कैसे एग्रीमेंट होता है… मुझे उस वक़्त कुछ नहीं मालूम था। उस वक़्त मैं कर लिया करता था। हां भाई, चलो, आपके लिए कर रहे हैं मतलब आपके लिए कर रहे हैं। वहां फिर धंधे का सवाल है।
‘ब्लैक फ्राइडे’ के गाने भी आपके ही थे। उनको उतना रेकग्निशन नहीं मिला जितना गुलाल को मिला।
हूं… हूं… नहीं इंडियन ओशियन का वह गाना तो बहुत हिट है। उनका करियर बेस्ट है अभी तक का गाना। (‘अरे रुक जा रे बंदे’)… लाइव कॉन्सर्ट करते हैं… उन्हीं के हिसाब से, दैट्स देयर ग्रेटेस्ट हिट! लेकिन अगर ‘ब्लैक फ्राइडे’ सुपरहिट हो जाती, मालूम पड़ता पीयूष मिश्रा ने लिखा है गाना तो… सिनेमा के चलने से बहुत बहुत फ़र्क पड़ता है। हम थियेटर वालों को थोड़ी हार मान लेनी चाहिए कि सिनेमा का मुक़ाबला नहीं कर सकते। वो तब तक नहीं होगा जब तक कि यहां (थियेटर की) इंडस्ट्री नहीं होगी। और इंडस्ट्री यहां पर होने का बहुत… यह देश इतना ज़्यादा हिन्दीवादी है ना… गतिशील ही नहीं है। यहां पर ट्रेडिशन ने सारी गति को रोक कर रख दिया है। हिन्दी-प्रयोग! पता नहीं क्या होता है हिन्दी प्रयोग? जो पसंद आ रहा है वो करो ना। हिन्दी नाटक… भाष्य हिन्दी का होना चाहिए, अरे हिन्दी भाष्य में कोई नहीं लिख रहा है नाटक यार। कोई ले दे के एक हिन्दी का नाटक आ जाता है तो लोग-बाग पागल हो जाता है की हिन्दी का नाटक आ गया! अब उन्हें नाटक से अधिक हिन्दी का नाटक चाहिए। लैंग्वेज के प्रति इतने ज़्यादा मुग्ध हैं… मैने जितने प्लेज़ लिखे उनमें से एक हिन्दी का नहीं था, सब हिन्दुस्तानी प्लेज़ थे।
एकेडमीशियन और थिएटर करने वालों में कोई फ़र्क नहीं (रह गया) है। जितने बड़े बड़े थिएटर के नाम हैं, सब एकेडमीशियन हैं। करने वाले बंदे ही अलग हैं। करने वाले बंदों को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। “यह नाटक कर रहा है… लेकिन वी नो ऑल अबाउट नाट्य-शास्त्र!” अरे जाओ, पढ़ाओ बच्चों को…
लेकिन आपका मानना है कि बॉम्बे में थियेटर चल रहा है… दिल्ली के मुक़ाबले।
दिल्ली में लुप्त हो गया है। दिल्ली में बाबू-शाही की क्रांति के तहत आया था थिएटर। (नकल उतारते हुए) “नाटक में क्या होना चाहिए – जज़्बा होना चाहिए! जज़्बा कैसा? लेफ्ट का होना चाहिए।” एक्सपेरिमेंटेशन भी पता नहीं कैसा! यहां पर देखो, यह अभी भी चल रहा है – मानव (कौल) ने लिखा है यह प्ले (पार्क)…

सपना सपना - अब्दुल्ला

बचपन में मैं अक्सर एक सपना देखा करता था कभी सोयी आँखों से तो कभी जगी आँखों से.मैं सपने में देखता कि मेरे घर के दक्षिण से गुजरनेवाली नहर रेलवे लाइन में बदल गई है और उस पर से छुक-छुक करती ट्रेन गुजर रहीं है.हालांकि न तो अब तक नहर से होकर रेलगाड़ी गुजरी है और न ही निकट-भविष्य में गुजरनेवाली है लेकिन आज भी मैं जब भी रेलयात्रा करता हूँ तो अभिभूत हो जाता हूँ.मूंगफली से लेकर चाय बेचनेवाले तक की मिली-जुली आवाज से उभरता प्यारा-सा शोर.कहीं ताश का आनंद लेते लोग तो कहीं गंभीर बहस में भाग लेते सभासद.कभी-कभी तो इन बहसों का स्तर इतना ऊंचा हो जाता है कि लोकसभा और राज्यसभा भी इस मामले में कहीं पीछे रह जाए.कभी-कभी तो बहस की तीक्ष्णता इतनी ज्यादा हो जाती है कि लगता है कि बहस करने वाले लोग यात्री नहीं देश के भाग्य विधाता हैं और अब देश का भाग्य बदलने ही वाला है.रेलगाड़ियाँ सिर्फ पैसेंजर को ही नहीं ढोतीं हैं ढूधवालों के दूध को, घासवालों की घांस को और सब्जीवालों की सब्जियों को भी ढोतीं हैं और साथ ही ढोतीं हैं इनके घरवालों के सपनों को.आराम के मामले में यातायात का कोई भी दूसरा साधन इसकी बराबरी नहीं कर सकता.पैखाना या पेशाब लगा हो तो बसयात्रियों की तरह घबराने की कोई जरूरत नहीं है सारी सुविधाएँ आपकी बोगी में ही मौजूद जो हैं.जब हमारे ईलाके में पहली बार रेलगाड़ियों का आगमन हुआ तो गंगा पर के लोग रेलयात्रा कर चुके लोगों से अक्सर पूछते कि रेलगाड़ी कैसी होती है?एक बार हुआ यह कि एक ग्रामीण ने दूसरे को पूछने पर बताया कि रेलगाड़ी काली होती है और जब वह चलती है तो ऊपर से धुआं और नीचे से पानी निकलता रहता है.वह बेचारा लोगों से पूछता-पूछता जा पहुंचा पूरे परिवारसहित पास के रेलवे स्टेशन पर.टिकट ले लिया और लगा इंतजार करने.तभी एक कूली जो गहरे काले रंग का था बीड़ी पीते हुए आया और पास की झाड़ी की तरफ मुंह करके पेशाब करने लगा.ग्रामीण ने देखा कि यह काला भी है और ऊपर से धुआं और नीचे से पानी उत्सर्जित भी कर रहा है.बस फ़िर क्या था छलांग लगाकर चढ़ गया कूली के कंधे पर और परिवार के दूसरे सदस्यों को चढ़ने को कहने लगा.बेचारे कूली की जान तभी छूटी जब असली ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर आ गई.खैर अब ऐसी घटना होने की सम्भावना नहीं रही क्योंकि अब भाप ईंजनों का चलना हमारे ईलाके में बंद हो चुका है जहाँ भाप ईंजन होगा वहां भले ही ऐसी घटनाएँ घटती हों.लेकिन हमें इतना सुख देनेवाली ट्रेनों के साथ हम कैसा व्यवहार कर रहे हैं?हम बिना टिकट लिए ट्रेन में चढ़ जाते हैं जबकि इसका भाड़ा सुविधाओं की तुलना में काफी कम होता है.खिडकियों में साईकिल से लेकर खाट तक लाद देते हैं. और सबसे बड़ी ज्यादती तो करते हैं मिनट-मिनट पर चेनपुल और वैकम करके.ऐसा करते समय हम यह नहीं सोंचते कि बांकी के यात्रियों को हमारे इस स्वार्थपूर्ण रवैय्ये से कितनी परेशानी होती होगी.अंत में मैं वैसे लोगों को जो भारतीय समाज को नजदीक से देखना चाहते हों को सलाह दूंगा कि वे रेलगाड़ी से यात्रा करें. इससे आपको दो फायदे होंगे.एक तो आपका ज्ञान बढेगा और दूसरा यह कि आपका सामाजिक सरोकार बढेगा जान-पहचान बढ़ेगी क्योंकि आप रेलयात्रा के दौरान कटे-कटे से नहीं रह सकते.इसलिए मैंने बच्चनजी की पंक्तियों में कुछ बदलाव कर दिया है-भेद कराते बस और टेम्पो मेल कराती रेलगाड़ी.

मंटो की बेटी से मुलाकात - अब्दुल्ला


सआदत हसन मंटो इन दिनों फिर से चर्चा में हैं। भारत-पाक बटवारे पर लिखी उनकी कहानी टोबाटेक सिंह की गिनती विश्व की बेहतरीन कहानियों में होती है। पैन नलिन इस पर आधारित एक फिल्म बनाने जा रही हैं। इस मौके पर पेश है उनकी बेटी से की गई एक बातचीतःसआदत हसन का जन्म 11 मई, 1912 को अमृतसर के ख़ानदानी बैरिस्टर परिवार में हुआ था.लेकिन उनकी क्रांतिकारी सोच और अतिसंवेदनशील लेखनी से 'मंटो' के रूप में उन्हें पूरी दुनिया में शोहरत मिली.पैदाइशी अफसानानिगार मंटो अगर आज जीवित होते तो उनकी उम्र 97 साल होती.पेश है उनकी बड़ी बेटी निकहत पटेल से हुई बातचीत के अंशः
किस तरह की यादें जुड़ी हैं अब्बा जान मंटो की आपके साथ?
बेहद अच्छी यादें हैं उनकी, हालांकि उनके साथ हमारा बहुत कम वक़्त गुज़रा. लेकिन मुझे याद है, वो बहुत प्यार करने वाले खुशमिजा़ज इंसान थे. वो हमें ही नहीं हमारे रिश्तेदारों के बच्चों को भी लाड़-दुलार किया करते थे.धुंधली सी याद है मुझे, बावर्चीखाने में खड़े हुए अपनी पसंद की डिश या पकोड़े अक्सर बनाया करते थे। तो इस तरह उनके साथ जो भी वक्त गुजरा ज़हन में आज भी है.
उनकी ऐसी कोई बात जो आपको दिलचस्प लगती हो, जिसे आप भूल नही़ पाती हों?
मैंने उन्हें कभी नमाज़ पढते नहीं देखा था। क्योंकि वह उस मायने में मज़हबी बिल्कुल नहीं थे. लेकिन उनका हर कहानी या मज़मून शुरू करने से पहले सफेह पर 786 लिखना दिलचस्प लगता था.
मंटो साहब की कौन सी कहानियां आपको ज़्यादा अच्छी लगती हैं ?
यूँ तो उनकी सभी कहानियां अच्छी हैं लेकिन खासतौर से 'काली शलवार', 'हादसे का खात्मा' और 'बू' कहानियां अच्छी लगती हैं। 'बू' मेरी पसंदीदा कहानी है.
मंटो का व्यक्तित्व और कहानियाँ दोनों ही विवादों में रहे हैं, लोगों की प्रतिक्रियाओं का आप पर कितना असर हुआ?
देखिए जिस वक़्त कहानी ‘बू’ पर मुकदमा चल रहा था उस वक्त मैं बहुत छोटी थी। रही बात लोगों की प्रतिक्रियाओं का हम पर असर होने की तो मैंने देखा कि उनके विरोधी कम और चाहने वाले ज़्यादा थे। इसलिए विरेधियों की बातों पर कभी गौ़र ही नहीं किया.
विवादों को आपकी अम्मी जान ने किस तरह लिया?
बहुत सहजता से। क्योंकि घर में मामू और फूफियों के अलावा पूरी साहित्यिक बिरादारी उनके साथ थी. इसलिए विरोध से वह कभी परेशान नहीं हुईं.
मंटो साहब के लेखन के बारे में वह क्या सोचती थीं ?
अम्मी बताती थीं कि अब्बाजान अपनी हर कहानी और मजमून सबसे पहले उन्हें ही सुनाया करते थे। और बताते थे कि इस कहानी या मजमून का मक़सद क्या है।
अम्मी से किस तरह का रिश्ता था मंटो साहब का?
होश आने पर जो घर के लोगों से जाना, वह यह कि रिश्तेदारों से उनका रिश्ता मोहब्बत और दोस्ती का था।बस अम्मी से उनकी झड़प शराबनोशी को लेकर हुआ करती थी. और उस वक्त भी वह अपनी कमज़ोरी और गलतियों को मान लेते थे.'मनो मिट्टी के नीचे दफन सआदत हसन मंटो आज भी यह सोचता है कि सबसे बड़ा अफसाना निगार वह है या ख़ुदा।'
मंटो की इस इबारत में आपको आत्मविश्वास और चुनौती नज़र आती है या ग़ुरूर?
मुझे तो सौ फीसदी आत्मविश्वास और साथ में चुनौती भी नज़र आती है..... गुरूर तो उनमें था ही नहीं .अगर अब्बा जान मंटो से कोई एक बात कहनी हो, तो वो क्या होगी?यही कि... ‘काश आपने शराबनोशी न की होती तो....हमें आपके साथ ज़्यादा रहने का मौका मिला होता....’ बस इतना ही।

मुलाकात अरुंधती राय से

आज पूरे देश में जो हिंसा का माहौल बना हुआ है, आप इन चीजों को कैसे देखती हैं? इनके क्या कारण हैं? इसे किस संदर्भ में देखा जाना चाहिए?
यह सब देख पाने के लिए विद्वान होना कोई जरूरी नहीं है। हमारे बीच एक ऐसा मध्यमवर्ग बढ़ रहा है, जिसमें स्वछंद-उपभोक्तावाद और बेतहाशा लालच पनप रही है। इसके लिए औद्योगिक पश्चिमी देशों ने तो संसाधनों की लूट व ‘श्रमिक-दासों’ के लिए उपनिवेश कायम कर लिये थे। लेकिन हमने तो अपने भीतर ही उपनिवेश कायम कर लिये हैं और खुद को ही खाना शुरू कर दिया है। बाज़ारीकरण के लिए बढ़ायी गयी यह बेतहाशा लालच, (इसे ही राष्‍ट्रवाद के रूप में बेचा जा रहा है) लालच की प्यास गरीबों से उनका जल-जंगल और जमीन को लूट करके ही बुझा सकते हैं।
आजाद भारत में जो सबसे सफल अलगाववाद आंदोलन हम देख रहे हैं, वह यह है कि उच्च और मध्यम वर्ग ने अपने आपको पूरे देश से काट लिया है, यह संघर्ष लम्बवत है, क्षैतिज नहीं। वे वैश्विक प्रभु वर्ग में शामिल होकर एक अलग स्वर्ग बना लेना चाहते हैं, क्योंकि वे इसे अपना हक समझते हैं। उन्‍होंने कोयला, खनिज, बाक्साइट, पानी और बिजली आदि सभी संसाधनों पर पहले ही कब्जा जमा लिया है। अब उन्हें और ज्यादा कारें, और ज्यादा बम, और ज्यादा खदानें- सुपरपावर्स के नागरिकों के लिए सुपरट्वायज (बम, मिसाइल आदि) बनाने के लिए गरीबों की जमीन की जरूरत है। यह पूरी तरह एक जंग ही है, जहां अमीर-गरीब दोनों तरफ के लोग अपने-अपने हथियार चुन रहे हैं। उच्च वर्ग की बेतहाशा लालच को पूरा करने के लिए ही सरकार और बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां ढांचागत समायोजन में जुटी हैं। इस व्यवस्था को विश्व बैंक, एफडीआई (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश), एडीबी (एशियन विकास बैंक), न्यायालय के आदेश, नीति-निर्माता, कार्पोरेट मीडिया और पुलिस आदि मिलकर सब के सब हांक रहे हैं। जनता की गर्दन दबा रहे हैं। इसके विपरीत, जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, उन्होंने धरने, भूख हड़ताल और सत्याग्रह किये, न्यायालय गये और हर उस काम को किया, लेकिन राहत नहीं मिली। इसलिए अब वे हताश होकर बंदूक उठा रहे हैं। क्या ये हिंसा बढ़ेगी? अगर जनता की प्रगति और संपन्नता मापने का बैरोमीटर सेंसेक्स और विकास दर ही है, तो निश्चित रूप से हिंसा बढ़ेगी। मैं इस सबको किस रूप में देखती हूं? इन चीजों को देखना ज्यादा मुश्किल नहीं है, यह तो साफ-साफ दिखाई दे रहा है। बीमारी तो सिर चढ़ गयी है।
आपने एक बार कहा था कि चाहे मैं हिंसा का सहारा नहीं लूगीं, लेकिन देश के हालात को देखकर उसकी निंदा करना मैं अनैतिक मानती हूं। क्या इसे आप तफसील से बता सकती हैं?
गुरिल्ला बन कर तो मैं बोझ बन जाऊंगी! मुझ शक है कि मैंने ‘अनैतिक’ शब्द का प्रयोग किया होगा। ‘नैतिकता’ शब्द गिरगिट जैसी हो गयी है, जो माहौल देख कर रंग बदल लेती है। मैं ऐसा महसूस करती हूं कि अहिंसक आंदोलन दशकों से इस देश की हर लोकतांत्रिक संस्था का दरवाजा खटका रहे हैं, लेकिन वे उपेक्षित और अपमानित ही हुए हैं। भोपाल गैस पीड़ितों या नर्मदा बचाओ आंदोलन को ही देख लीजिए। नर्मदा बचाओ आंदोलन के पास किसी भी दूसरे जनांदोलनों की अपेक्षा एक रसूख वाला नेतृत्व, मीडिया कवरेज और संसाधन थे। लेकिन हुआ क्या? आज लोग रणनीति पर पुनर्विचार के लिए बाध्य हो गये हैं। आज जब सोनिया गांधी दावोस के वर्ल्ड इकॉनामिक फ़ोरम का गुणगान कर रही हैं, तो हमारे लिए यह सोचने और चौंकने का समय है। उदाहरण के तौर पर क्या आज एक लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य में सविनय अवज्ञा करना संभव रह गया है?क्या यह ऐसे युग में संभव है, जबकि मीडिया बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा नियंत्रित है और गलत सूचनाएं जनता तक पहुंचा रहा है? क्या भूख हड़ताल और ‘सेलिब्रेटी पोलिटिक्स’ के बीच नाभिकीय रिश्‍ता हो गया है? अगर नांगला मांछी या भटी माइन्स के लोग भूख हड़ताल करने लगें, तो क्या कोई उनकी परवाह करेगा? इरोम शर्मिला पिछले छह सालों से भूख हड़ताल पर है। यह हममें से कइयों के लिए सबक भी है। मैंने हमेशा यह महसूस किया है कि यह एक माखौल की बात है कि ऐसे देश में जहाँ अधिकांश लोग भूखे रहते हैं, वहां भूख हड़ताल को राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। अब ज़माना बदल गया है, हमारे शत्रु का स्वरूप बदल गया है। हम एनजीओ के युग में प्रवेश कर चुके हैं या कहें कि हम ‘पालतू शेर’ के एक युग में प्रवेश कर चुके हैं, जहां जनांदोलन का रास्ता भी फिसलन भरा हो सकता है। पैसे देकर प्रदर्शन और प्रायोजित धरने कराये जाते हैं, सोशल फोरम बनायी जाती हैं, जो लड़ाकू प्रवृत्ति रखने की नाटकीय भूमिका अदा करती हैं, लेकिन वह जो उपदेश देती हैं, खुद उसका कभी पालन नहीं करतीं। हमारे पास भिन्न-भिन्न तरह के ‘आभासी’ विरोध होते हैं। सेज़ बनाने वाले ही सेज़ के खिलाफ़ बैठकों को प्रायोजित कर रहे हैं। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियां ही पर्यावरण सुरक्षा और सामुदायिक कार्यों के लिए पुरस्कार और सहायता दे रही हैं। उड़ीसा के जंगलों में बाक्साइट का उत्खनन करने वाली कंपनी ‘वेदांता’ अब विश्वविद्यालय शुरू करना चाहती है। टाटा के दो चैरिटेबल ट्रस्ट हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से देश भर के जनांदोलनों और आंदोलनकारियों को पैसे दे रहे हैं। क्या यही कारण तो नहीं है कि सिंगूर की आलोचना नंदीग्राम से कम हो रही है और शायद इसीलिए न तो उन्‍हें निशाना बनाया गया है, न ही बहिष्कार व घेराव किया गया है।
निश्चित रूप से टाटा और बिड़ला ने गाँधी को भी पैसा दिया था- शायद वही (गांधी) हमारे पहले एनजीओ थे। लेकिन आज के एनजीओ तो बहुत शोर करते हैं, बहुत सी रिपोर्टें लिखते हैं, लेकिन सरकार को इनसे किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं है। पूरे राजनीतिक माहौल में भाड़े के लोग अपनी नौटंकी को ही असली राजनीति साबित करने में जुटे हैं। दिखावे का प्रतिरोध आज बोझ बन गया है।
एक समय था जब जनांदोलन न्याय के लिए न्यायालय की तरफ़ देखते थे, लेकिन अब तो न्यायालयों ने पक्षपातपूर्ण फैसलों की झड़ी लगा दी है। अनेकों ऐसे निर्णय दिये हैं, जो अन्यायपूर्ण हैं, जिनमें गरीबों की इतनी बेइज्जती की जा रही है और जो भाषा इस्तेमाल की गयी है, उससे तो हलक सूख जाता है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फ़ैसले में वसन्तकुंज मॉल के पुन:निर्माण की आज्ञा दी है। हालांकि इसके पास आवश्यक कानूनी मंज़ूरी भी नहीं है। इस फैसले में न्यायालय ने कहा कि किसी भी कारपोरेशन द्वारा गोरखधंधा करने का सवाल ही नहीं उठता है।
बहुराष्ट्रीय भूमंडलीकरण के दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा भूमि हड़पने, एनरॉन और मोन्सेंटो, हेलीबर्टन और बैक्टेल के ज़माने में यह बोलना देश की सबसे शक्तिशाली संस्थाओं की विचारधारा को उजागर कर देती है। कॉर्पोरेट प्रेस के साथ-साथ न्यायपालिका भी नवउदारवाद का हथियार बन गयी है।
ऐसे माहौल में जबकि लोग खुद को इस अनवरत लोकतांत्रिक प्रक्रिया से थका हुआ महसूस कर रहे हैं, उन्हें केवल जलील किया जाता है, ऐसे में उनको क्या करना चाहिए? ऐसा नहीं है कि उनके पास हिंसा या अहिंसा का ही रास्ता बचा है। ऐसे राजनीतिक दल भी हैं, जो सशस्त्र संघर्ष में भरोसा तो करते हैं, लेकिन यह उनकी पूरी स्ट्रैटेजी का केवल एक हिस्सा है। इन संघर्षों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बेरहमी से मारा-पीटा गया है और झूठे आरोप भी लगाये भी गये हैं। गिरफ़्तार भी किया गया है। जनता इस बात को अच्छी तरह समझती है कि हथियार उठाने का मतलब क्या है- हिन्दुस्तान के राजकीय हिंसा के हज़ारों रूपों को झेलना। छापामार सशस्त्र संघर्ष अगर रणनीति बन जाए तो आपकी दुनिया सिमट जाती है और सिर्फ दो ही रंग- श्‍वेत या श्‍याम दिखाई पड़ते हैं। लेकिन सभी विकल्प खत्म हो जाने पर हार कर जनता हथियार उठाने का निर्णय लेती है, तब क्या हमें उसकी निंदा करनी चाहिए? क्या कोई विश्वास करेगा कि अगर नंदीग्राम के लोग धरना देते या गाना गाते तो पश्चिम बंगाल सरकार अपना निर्णय वापस ले लेती?
हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां निष्‍िक्रय रहने का मतलब निरंकुशता का समर्थन करना है (जो निश्चित रूप से हममें से कुछ लोगों को भाता भी है) और सक्रिय होने का मतलब भयानक कीमत चुकाना है और जो लोग इस कीमत को चुकाने के लिए तैयार हैं, उनकी आलोचना करना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल है।
आपने बहुत सारी यात्राएं की हैं- बहुत सारे संघर्षों को भी देखा है- क्या उनके बारे में कुछ बता सकती हैं? आप कौन सी ऐसी जगहों पर गयीं हैं? क्या इन जगहों के कुछ संघर्षों के मुद्दों पर आप रोशनी डाल सकती हैं?
बहुत बड़ा प्रश्न है- क्या कहूं? कश्मीर में सैनिक कब्जा, गुजरात में नवफासीवाद, छत्तीसगढ़ में गृहयुद्ध, उड़ीसा में बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों द्वारा लूट, नर्मदा घाटी में सैकड़ों गांवों का डूबना, भुखमरी के कगार पर खड़े लोग, जंगलों का उजाड़ा जाना और भोपाल गैस त्रासदी के 24 सालों के आंदोलन से पीड़ितों को कुछ नहीं मिलने के बावजूद पश्चिम बंगाल सरकार नंदीग्राम में यूनियन कार्बाइड (जिसे अब ‘डॉव केमिकल्स’ ने खरीद लिया है) को दोबारा निमंत्रण दे रही है। मैं इधर आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र तो नहीं गयी, लेकिन हम जानते हैं कि वहां लगभग एक लाख किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। आंध्रप्रदेश में हुईं झूठी गिरफ्तारियों और भयानक दमन के बारे में हम जानते ही हैं। इनमें से हर स्थान का अपना विशिष्ट इतिहास, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण है। इनका विश्लेषण करना आसान नहीं है, फिर भी इन सबमें कुछ चीजें जैसे विशाल अंतरराष्ट्रीयता, सांस्कृतिक और आर्थिक दबाव के कारण एक जुड़ाव है। हिन्दुत्व प्रोजेक्ट की भी मैं बात करना चाहूंगी, जो हमारी नसों में अपना ज़हर फैला रहा है और एक बार फिर फटने का इंतज़ार कर रहा है। मैं कहूंगी कि इस सबके बाद भी विडम्बना तो यह है कि हम अब भी एक देश, एक संस्कृति और एक समाज हैं, जहां आज भी छुआछूत की प्रथा का प्रचलन है। जहां हमारे अर्थशास्त्री वृद्धि दर को लेकर डींग हांकते हैं, जबकि देश में अभी भी पेट पालने के लिए लाखों दलित प्रतिदिन दूसरे लोगों के कई मन मैल अपने सिर पर ढोते हैं। दुनिया में कोई और ऐसा सुपरपावर है क्या?
हाल ही में बंगाल में हुई राज्य और पुलिस द्वारा हिंसा को कैसे देखा जा सकता है?
यह मामला किसी अन्य दूसरे राज्यों में हुई राज्य और पुलिस द्वारा हिंसा से अलग नहीं है- इसमें पाखंड और दोमुंहे व्याख्यानों का मामला भी शामिल है, जिसमें मुख्यधारा के वामपंथी दल सहित अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों की वाकपटुता शामिल है। क्या साम्यवादियों की गोलियां पूंजीवादियों से अलग हैं? अजीब-अजीब घटनाएं हो रही हैं। सऊदी अरब में बर्फ पड़ रही है, तो कहीं दिन में उल्लू दिखाई दे रहे हैं। चीन सरकार निजी संपत्ति के अधिकार विधेयक को पारित करने के लिए बैठक कर रही है। मुझे नहीं पता कि क्या यह सब वातावरण परिवर्तन की वजह से हो रहा है! चीन के साम्यवादी इक्कीसवीं सदी के सबसे बड़े पूंजीवादी बन रहे हैं। तो फिर हम अपने संसदीय वामपंथियों से अलग उम्मीद क्यों करें? नंदीग्राम और सिंगूर इस बात के स्पष्‍ट संकेत हैं।
यह सोचने की बात है कि क्या हर क्रांति का अंत आधुनिक-पूंजीवाद होता है? ज़रा सोचिए, आपको हैरानी होगी- फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति, चीनी क्रान्ति, वियतनाम युद्ध, रंगभेद विरोधी संघर्ष और भारत में स्वतंत्रता के लिए कथित गांधीवादी संघर्ष! इन सबका अंजाम क्या हुआ? क्या यह कल्पना का अंत है?
बीजापुर में माओवादी हमला, जिसमें पचपन पुलिसकर्मियों की मौत हुई थी, क्या यह विद्रोह राजकीय हिंसा का ही दूसरा चेहरा तो नहीं है?
कैसे यह कहा जा सकता है कि यह हमला राजकीय हिंसा का दूसरा चेहरा है? क्या कोई यह कहेगा कि जो लोग रंगभेद के खिलाफ़ लड़े, चाहे उनके तरीके कैसे भी रहे हों, वह भी राजकीय हिंसा का दूसरा रूप था? जो अल्जीरिया में फ्रांसीसियों से लड़े, उनके बारे में आप क्या कहेंगे? या जो नाजियों से लड़े, जो उपनिवेशवादी ताकतों से लड़े, या वे जो इराक में अमेरिकी कब्जे के खिलाफ़ लड़ रहे हैं, क्या यह सब भी राजकीय हिंसा का दूसरा रूप है? इससे आधुनिक मानव अधिकार वाली रिपोर्ट की भाषा का प्रयोग कर हम राजनीतिक बन जाते हैं, जिससे असली राजनीति बह जाती है। जितना भी हम धर्मात्मा बनने की कोशिश करें, जितना भी हम अपनी जटा में भभूत लगाएं, हमारे पास कोई विकल्प नहीं रह गया है। लेकिन दु:खद तो यह है कि हम हिंसा के माहौल में खुद को साफ-सुथरा नहीं रख सकते, हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं है। छत्तीसगढ़ में गृहयुद्ध चल रहा है, जिसे राज्य सरकार चला रही है और सार्वजनिक रूप से बुश सिद्धांत का पालन कर रही है- ‘अगर तुम हमारे साथ नहीं हो तो तुम आतंकवादियों के साथ हो।’ इस जंग में औपचारिक सुरक्षा बलों के साथ-साथ सलवा-जुडूम भी एक प्रमुख हथियार है, जो नागरिक सेना का सरकारी समर्थन प्राप्त सशस्त्र सैनिक है, जो ‘स्पेशल पुलिस आफ़िसर’ (एसपीओ) बनने को मजबूर हो गया है। सरकारों ने कश्मीर, मणिपुर नागालैंड में भी यही कोशिश की है। हजारों लोग मारे गये हैं। लाखों लोगों को सताया गया है। हजारों लोग लापता हो गये हैं। कोई ‘बनाना रिपब्लिक’ ही ऐसी चीजों पर गर्व कर सकती हैं… और अब सरकार इन नकारा तरीकों को हर जगह पर लागू करना चाहती है। हजारों आदिवासी अपनी खनिज प्रधान ज़मीनों को पुलिस छावनी में बदलने पर मजबूर हो गये हैं। सैकड़ों गांवों को ज़बरदस्ती खाली करा दिया गया है। जिन ज़मीनों में लौह-अयस्क बहुतायत में है, वहां टाटा और एस्सार जैसी कंपनियों की गिद्ध-दृष्टि लगी हुई है। ज़मीन देने के समझौता-पत्रों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किये गये हैं, लेकिन कोई नहीं जानता कि उनमें क्या कहा गया है, पर भूमि अधिग्रहण शुरू हो गया है। इसी तरह की घटनाएं दुनिया के सबसे ज़्यादा उजड़े हुए देशों में से एक कोलंबिया में हो रही हैं। जब सबकी आखें सरकारी समर्थन प्राप्त नागरिक सैनिकों और गुरिल्ला सैनिकों के बीच बढ़ती हुई हिंसा पर लगी है, तो ऐसे समय में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां चुपचाप खनिज सम्पदा लूटने में लगी हुई हैं। रंगमंच की ऐसी ही छोटी सी ‘स्क्रिप्ट’ छत्तीसगढ़ में लिखी जा रही है।
वास्तव में यह दुख की बात है कि 55 पुलिसकर्मी मारे गये, लेकिन वे भी दूसरों की तरह सरकारी नीति के ही शिकार हैं। सरकार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए तो मात्र वे एक तोप के गोले के तरह हैं- पुलिसकर्मी तो सत्ता के हथियार मात्र हैं, कुछ मर गये तो सरकारें और भर्ती कर लेंगी। ऐसी मौतों पर मगरमच्छ के आंसू बहाये जाएंगे, कुछ समय के लिए टीवी एंकर हमें भी फड़फड़ा देते हैं। होगा क्या? और पुलिसकर्मी आ जाएंगे। जहां तक माओवादियों की बात है- तो उन्होंने जिन पुलिस और ‘पुलिस के विशेष अधिकारियों’ (एसपीओ) व सरकारी अधिकारियों को मारा, वे सब दमन, यातनाओं, हत्याओं और झूठे मुठभेड़ों के आरोपी थे। गांवों को जलाना और स्त्रियों के साथ बलात्कार करना उनके व्यवसायिक कर्तव्यों में था। चाहे कितना ही दूर तक सोच लीजिए- अगर वे वास्तव में ऐसे हैं- तो वे निर्दोष नागरिक नहीं हैं।
मुझे इनमें कोई संदेह नहीं कि माओवादी आतंक और दमन के एजेंट हैं। मुझे इसमें भी कोई शक नहीं कि उन्होंने भी बेरहमी की होंगी। बेशक वे इस बात का भी दावा नहीं कर सकते कि स्थानीय लोग बिना किसी प्रतिरोध के उनका समर्थन कर रहे हैं- लेकिन यह दावा कौन कर सकता है? फिर भी कोई गुरिल्ला सेना बिना स्थानीय समर्थन के टिक भी तो नहीं सकती। यह तार्किक रूप से भी असंभव है और माओवादियों का समर्थन कम नहीं हुआ है, बल्कि बढ़ रहा है। जनता के पास कोई विकल्प नहीं है। सिवाय इसके कि वह जिसको कम बुरा समझती है, उसकी ओर हो जाती है। पर यह कहना कि नाइंसाफी के खिलाफ जो लड़ रहे हैं और जो नाइंसाफी सरकार कर रही है- दोनों एक जैसे हैं, अजीब सी बात है। सरकार ने अहिंसक प्रतिरोध के लिए सभी दरवाजे बंद कर लिये हैं। इस पर जब लोग हथियार उठाते हैं, तो हर प्रकार की हिंसा होने लगती है- क्रांतिकारी, लम्पट और पूरी तरह अपराधी। इससे उत्पन्न हुई भयानक परिस्थितियों के लिए सरकार खुद उत्तरदायी है।
‘नक्सली’, ‘माओवादी’ और ‘बाहरी लोग’ इस तरह के शब्द आजकल बहुत ज़्यादा इस्तेमाल किये जा रहे हैं। क्या आप इन्हें परिभाषित कर सकती हैं?
‘बाहरी ताकतें’… इस तरह का दोषारोपण दमन की प्रारंभिक अवस्था में किसी भी सरकार द्वारा किया जाना स्वाभाविक है। किसी भी घटना के लिए सरकारें सहजता से सारा दोष बाहरी ताकतों के सिर मढ़ देती हैं और अपने ही प्रचार पर विश्वास करने लगती हैं और सरकारें शायद इस बात का अनुमान भी नहीं लगा पातीं कि जनता उसके विरोध में खड़ी हो गयी है। यही सब बंगाल में माकपा कर रही है। हालांकि कुछ लोग कहेंगे कि बंगाल में यह दमन नया नहीं है। बस अब केवल बढ़ गया है- फिर भी ये ‘बाहरी ताकतें’ कौन हैं? सीमाओं का निर्धारण कौन करता है? क्या वे गांव की सीमाएं हैं? तहसील? ब्‍लॉक? ज़‍िला या राज्य की सीमाएं हैं? क्या संकीर्ण क्षेत्रीय और धार्मिक राजनीति साम्यवादियों का नया मंत्र है? रही नक्सली और माओवादियों की बात- भारत पुलिस राज्य बनता जा रहा है, जिसमें जो भी व्यवस्था का समर्थन नहीं करेगा, उसे आतंकवादी करार दिये जाने का खतरा उठाना पड़ेगा। मुस्लिम आतंकवादी को मुस्लिम होना जरूरी है- आदि जैसे वर्गीकरण से बचने के लिए उन्हें एक ऐसा नाम चाहिए था, जो सभी को परिभाषित कर दे। इसलिए परिभाषाओं को छोड़ दें, बिना परिभाषा के ही ठीक है। क्योंकि वह समय दूर नहीं, जब हम सभी को माओवादी या नक्सलवादी, आतंकवादी या आतंकवादियों का समर्थक कहा जाएगा और फिर जेलों में बंद कर दिया जाएगा, उन लोगों के द्वारा जो वास्तव में या तो जानते नहीं हैं या इस बात की परवाह नहीं करते हैं कि माओवादी या नक्सली कौन हैं। गांवों में यह कार्यक्रम शुरू हो गया है और हज़ारों लोगों को जेलों में डाला जा रहा है। उन्हें राज्य को समाप्त करने की कोशिश करने वाला आतंकवादी करार दिया गया है।
असली नक्सली और माओवादी कौन हैं?
मैं इस विषय की विशेषज्ञ तो नहीं हूं, लेकिन इनका एक मौलिक इतिहास है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन 1925 में हुआ था और 1964 में इसका विभाजन हुआ और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी – माकपा इससे अलग हो गयी और एक अलग पार्टी बना ली। दोनों ही संसदीय राजनीतिक दल थे। 1967 में माकपा ने कांग्रेस से अलग हुए एक ग्रुप के साथ पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल की। उस समय देहात के भूखों मर रहे किसानों में काफ़ी रोष था। माकपा के स्थानीय नेता कानू सान्याल और चारू मजूमदार ने नक्सलबाड़ी जिले में किसानों को संगठित किया और यहीं से नक्सली शब्द की शुरुआत हुई। 1969 में सरकार गिर गयी और सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व में कांग्रेस के हाथ में पुन: सत्ता आ गयी। नक्सलियों को निर्दयता से कुचला गया। इस समय के बारे में महाश्वेता देवी ने लिखा भी है। 1969 में माकपा से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (लेनिनवादी-मार्क्सवादी) – ‘सीपीआई (एमएल)’ अलग हो गयी। कुछ सालों के बाद 1971 के आसपास सीपीआई (एमएल) कुछ दलों में बंट गयी। जैसे बिहार में सीपीआई एमएल (लिबरेशन), सीपीआई एमएल(न्यू डिमोक्रसी) जो आंध्र प्रदेश और बिहार के कई हिस्सों में काम कर रही है और सीपीआई एमएल (वर्गसंघर्ष) जो मुख्य रूप से बंगाल में सक्रिय है। इन दलों को ही नक्सली कहा जाता है। वे अपने को माओवादी नहीं, बल्कि लेनिनवादी मार्क्सवादी के रूप में देखते हैं। वे चुनावों, जनकार्यवाही और हमला होने की स्थिति में सशस्त्र संघर्ष में भी विश्वास करते हैं। बिहार में कार्यरत एमसीसी (माओईस्ट कम्युनिस्ट सेंटर) का गठन 1968 में हुआ था। आंध्र प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में क्रियाशील पीडब्‍ल्‍यूजी (पीपुल्स वार ग्रुप) 1980 में बनी थी और एमसीसी और पीडब्‍ल्‍यूजी ने 2004 में ही मिलकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का गठन किया है। वे राज्य को समाप्त करने और पूर्ण युद्ध में विश्वास करते हैं। वे चुनाव में भाग नहीं लेते। यही वह दल हैं, जो बिहार, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में गुरिल्ला युद्ध कर रहे हैं।
भारत सरकार और मीडिया माओवादियों को ‘आंतरिक सुरक्षा’ के लिए बड़े खतरे के रूप में देखते हैं। क्या उन्हें इसी रूप में देखा जाना चाहिए?
मुझे यकीन है कि माओवादी इस परिभाषा से काफी खुश होंगे।
माओवादी व्यवस्था बदलने के मकसद से लड़ रहे हैं। वे माओ की तानाशाही विचारधारा से प्रेरणा लेते हैं। वे क्या विकल्प तय करेंगे? क्या उनके शासन में शोषणकारी निरंकुश हिंसा नहीं होगी? क्या वे पहले से ही आम आदमी का शोषण नहीं कर रहे हैं? क्या वास्तव में उन्हें आम आदमी का समर्थन मिल रहा है?
मुझे लगता है कि हमारे लिए यह बताना जरूरी है कि माओ और स्टालिन दोनों ही हत्याओं के इतिहास के साथ संदिग्ध हीरो हैं। उनके शासन में करोड़ों लोग मारे गये थे। चीन और सोवियत संघ में जो कुछ हुआ, उसके अलावा पोलपोट ने चीनी साम्यवादी दल के समर्थन से कम्बोडिया में दो लाख लोगों को खत्म कर दिया था (इस दौरान पश्चिमी देशों ने जान-बूझ कर चुप्पी साध रखी थी) और लाखों लोगों को बीमारी और भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया था। क्या हम चीन में हुई सांस्कृतिक क्रान्ति की हिंसा से मुंह मोड़ सकते हैं? या इस बात को नकार सकते हैं कि सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में लाखों लोग लेबर कैंपों और टार्चर-चैम्बरों, जासूसों और गुप्तचरों व पुलिस के शिकार नहीं हुए थे? इनका इतिहास भी पश्चिमी साम्राज्यवाद के इतिहास की तरह अंधकारमय ही है। बस केवल इतना फर्क है कि इसका जीवनकाल बहुत छोटा था। अगर हम तिब्बत और चेचन्या के मुद्दे पर मौन रहते हैं, तो हम इराक, फिलीस्तीन, और कश्मीर में हो रही कार्यवाहियों की आलोचना भी नहीं कर सकते। मैं यह उम्मीद करूंगी कि माओवादी, नक्सली और मुख्य वामपंथी अपने इतिहास से सीख लेते हुए अपने इतिहास को दोबारा नहीं दोहराएंगे और भविष्‍य में जन-विश्वास को कायम रखेंगे। क्योंकि लोग यही उम्मीद करते हैं कि इतिहास दोहराया नहीं जाएगा। लेकिन वे इससे पलटते हैं, तो जनता का विश्वास नहीं जीत सकते… फिर भी नेपाल के माओवादियों ने नेपाल के राजतंत्र के खिलाफ़ बहादुरी और सफ़लतापूर्वक संघर्ष किया है और अब भारत में भी माओवादी और विभिन्न लेनिनवादी-मार्क्सवादी दल अन्याय के खिलाफ़ लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं। वे न केवल राज्य बल्कि सामंती ज़मींदारों और उनके सशस्त्र सैनिकों के खिलाफ़ भी संघर्ष कर रहे हैं। लड़ने वालों में वे आज अकेले ही हैं और इसके लिए मैं उनकी प्रशंसा करती हूं। ऐसा हो सकता है, जैसा आपने कहा कि जब उनके हाथ में सत्ता आये तो वे क्रूर, अन्यायी और निरंकुश और शायद वर्तमान सरकार से भी बुरे साबित हों। हो सकता है, लेकिन मैं इस सब के बारे में पूर्वधारणा बनाने के लिए तैयार नहीं हूं। अगर वे ऐसे बनते हैं, तो हमें उनके खिलाफ़ भी लड़ना होगा और उसके लिए पहला व्यक्ति कोई मेरे जैसा ही होगा। लेकिन अभी तो यह समझना ज़रूरी है कि वे प्रतिरोध के मोर्चे पर सबसे आगे खड़े हैं। हममें से कई लोग, उन लोगों के साथ हो लेते हैं, जहां हमें पता है कि यहां धार्मिक या वैचारिक रूप से हमारी कोई जगह नहीं है। यह सच है कि सत्ता मिलते ही प्रत्येक स्वाभाविक रूप से बदल जाता है। मंडेला के अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस को ही देख लीजिए- भ्रष्‍ट, पूंजीवादी, आईएमएफ के आगे सिर झुकाने वाली, गरीबों को उनके घर से बेघर करने वाली, लाखों इन्डोनेशियाई साम्यवादियों की हत्या करने वाले सुहार्तो का सम्मान करने वाली (जिसे दक्षिण अफ्रीका के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार से नवाजा गया था)- किसने सोचा था कि ऐसा होगा, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि दक्षिण अफ्रीका को रंगभेद के खिलाफ़ संघर्ष को रोक देना चाहिए था? या फिर इसके लिए उन्हें अब पछताना चाहिए? क्या इसका मतलब यह है कि अल्जीरिया को फ्रांसीसी उपनिवेश में बने रहना चाहिए? क्या कश्मीरियों, फिलिस्तीनियों और इराकियों को सैनिक कब्जा को स्वीकार कर लेना चाहिए? जिन लोगों की गरिमा को चोट पहुंची है, क्या उन्हें लड़ाई छोड़ देनी चाहिए? इसलिए कि उन्हें जंग में नेतृत्व करने वाला कोई संत-महात्मा नहीं मिला।
क्या हमारे समाज में आपसी संवाद की भाषा ख़त्म हो गयी है?
बिल्कुल।

मुलाकात पीयूष मिश्र से

पीयूष मिश्रा से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई। पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक ‘स्केलेटन वुमन’ था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए। मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूं एक हिंदी ब्लॉग के लिए – साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी। उन्होंने ज़्यादा सोचे बिना कहा – परसों आ जाओ, यहीं, मानव (कौल) का प्ले है, उससे पहले मिल लो। बातचीत बहुत लंबी नहीं हुई पर पीयूष जितना तेज़ बोलते हैं, उस हिसाब से बहुत छोटी भी नहीं रही। उनके गीतों का रेस्टलेसनेस उनके लहज़े में भी दिखा और उनके लफ्ज़ों में भी। ये तो नहीं कहा जा सकता कि वो पूरे इंटरव्यू में ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ रहे पर कुछ जगहों पर कोशिश ज़रूर नज़र आयी। पर बातचीत का अंतिम चरण आते आते उन्होंने खुद को बह जाने दिया और थियेटर-वाले पाले से भी बात की, जबकि बाकी के ज़्यादातर सवालों में वो यही यकीन दिलाते दिखे कि अब पाला बदल चुका है।
लिखित इंटरव्यू में वीडियो रिकार्डेड बातचीत के ज़रूरी सवालों का जोड़ है, पर पूरा सुनना हो तो वीडियो ही देखें। पृथ्वी थियेटर की बाकी टेबलों पर चल रही बहस और बगल में पाव-भाजी बनाते भाई साब की बदौलत कुछ जगहों पर आवाज़ साफ नहीं है। ऐसे ‘गुम’ हो गए शब्दों का अंदाज़न एवज दे दिया है, या खाली डॉट्स लगा दिए हैं। मैं थोड़ा नरवस था, और कुछ जगहों पर शायद सवालों को सही माप में पूछ भी नहीं पाया, पर शुक्रिया पीयूष भाई का कि उन्होंने भाव भी समझा और विस्तार में जवाब भी दिया।
समां बहुत बांध लिया, अब लीजिए इंटरव्यू: वरुण ग्रोवर
आपका अब भी लेफ्ट विचारधारा से जुड़ाव है?
(लेफ्टिस्ट होने का मतलब ये नहीं कि) परिवार के लिए कम्प्लीटली गैर-ज़िम्मेदार हो जाओ।
लेफ्ट बहुत अच्छा है एक उमर तक… उसके बाद में लेफ्ट आपको… या तो आप लेफ्टिस्ट हो जाओ… लेफ्टिस्ट वाली पार्टी में मिल जाओ… तब आप बहुत सुखी… (तब) लेफ्ट आपके जीवन का ज़रिया बन सकता है।
और अगर आप लेफ्ट आइडियॉलजी के मारे हो… तो प्रॉब्लम यह है कि आप देखिए कि आप किसका भला कर रहे हो? सोसाइटी का भला नहीं कर सकते, एक हद से आगे। सोसाइटी को हमारी ज़रूरत नहीं है। कभी भी नहीं थी। आज मैं पीछे मुड़ के देखता हूं तो लगता है कि (लेफ्ट के शुरुआती दिनों में भी) ज़िंदा रहने के लिए, फ्रेश बने रहने के लिए, एक्टिव रहने के लिए (ही) किया था तब… बोलते तब भी थे की ज़माने के लिए सोसाइटी के लिए किया है।
तो अब पॉलिटिक्स से आपका उतना लेना देना नहीं है?
पॉलिटिक्स से लेना देना मेरा… तब भी अंडरस्टैंडिंग इतनी ही थी। मैं एक आम आदमी हूं, एक पॉलिटिकल कॉमेंटेटर नहीं हूं कि आज (…..) आई विल बी ए फूल टू से दैट आई नो सम थिंग! पहले भी यही था… हां लेकिन यह था कि जागरूक थे। एज़ पीयूष मिश्रा, एज़ अन आर्टिस्ट उतना ही कल था जितना कि आज हूं। (अचानक से जोड़ते हैं) पॉलिटिक्स है तो गुलाल में!
हां लेकिन जो लोग ‘एक्ट वन’ को जानते हैं, उनका भी यह कहना है कि ‘एक्ट वन’ में जितना उग्र-वामपंथ निकल के सामने आता था, ‘एक्ट वन’ की एक फिलॉसफी रहती थी कि थियेटर और पॉलिटिक्स अलग नहीं हैं, दोनों एक ही चीज़ का ज़रिया हैं।
ठीक है, वो ‘एक्ट वन’ हो गया। ‘एक्ट वन’ ने बहुत कुछ सिखाया। ‘एक्ट वन’ (की) ‘सो कॉल्ड’ उग्र-वामपंथी पॉलिसी ने बहुत कुछ दिया है मुझको। (लेकिन) उससे मन का चैन चला गया। ‘एक्ट वन’ ने (जीना) सिखाया… ‘एक्ट वन’ की जो ‘सो-कॉल्ड’ उग्र-वामपंथी पॉलिटिक्स है, यह, मेरा ऐसा मानना है की इनमें से अधिकतर लोग जो हैं तले के नीचे मखमल के गद्दे लगाकर पैदा होते हैं। वही लोग जो हैं वामपंथ में बहुत आगे बढ़ते हैं। अदरवाइज़ कोई, कभी कभार, कुछ नशे के दौर में आ गया। (कोई) मारा गया सिवान में! अब सिवान कहां पर है, लोगों से पूछ रहे हैं… सफ़दर हाशमी मारा जाता है, तहलका मच जाता है, ट्रस्ट बन जाते हैं, न मालूम कौन कौन, (जो) जानता नहीं है सफ़दर को, वो जुड़ जाता है और वहाँ पर मंडी हाउस में… फोटो छप रहे हैं, यह है, वो है… सहमत! चंद्रशेखर को याद करने के लिए पहले तो नक़्शे में सिवान को देखना पड़ेगा, है कहां सिवान? कौन सा सिवान? कैसा सिवान? कौन सा चंद्रशेखर? सफ़दर के नाम से जुड़ने के लिए ऐसे लोग आ जाते हैं, जो जानते नहीं थे सफ़दर को… सफ़दर का काम, सफ़दर का काम… क्या है सफदर का काम? मैं उनकी (सफ़दर की) इन्सल्ट नहीं कर रहा… ऐसे ऐसे काम कर के गए हैं कि कुछ कहने की… खामोशी की मौत मरे हैं। मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता! थियेटर वाले की जवानी बहुत खूबसूरत हो सकती है, थियेटर वाले का बुढ़ापा, हिन्दुस्तान में कम से कम, मैं नहीं समझता कि कोई अच्छी संभावना है।
अधिकतर लोग सीनाइल (सठिया) हो जाते हैं। अचीवमेंट के तौर पर क्या? कुछ तारीखें, कुछ बहुत बढ़िया इश्यूस भी आ गये… कर तो लिया यार… अब कब तक जाओगे चाटोगे उसको? चार साल पहले जब मैं दिल्ली जाया करता था तो मेरा मोह छूटता नहीं था, मैं जाया करता था वहां पर जहां मैं रिहर्सल करता था… शक्ति स्कूल या विवेकानंद। ज़िंदगी बदल गयी यार, दैट टाइम इज़ गॉन! अच्छा टाइम था, बहुत कुछ सिखाया है, बहुत कुछ दिया है, इस तरह मोह नहीं पालना चाहिए।
एनके शर्मा जी अभी भी वहीं हैं, उनके साथ के लोग एक-एक कर के यहां आते रहे… मनोज बाजपाई, दीपक डोबरियाल। उनका क्या व्यू है? थियेटर से निकलकर आप लोग सिनिमा में आ रहे हैं?
एनके शर्मा जी का व्यू अब आप एनके शर्मा से ही पूछो। उनका ना तो मैं स्पोक्स मैन हूं… उनसे ही पूछो!
बॉम्बे में एक ऑरा है उनको लेकर… वो लोगों (एक्टर्स) को बनाते हैं।
टॉक टू हिम… टॉक टू हिम!
आप खुद को पहले कवि मानते हैं या एक्टर?
ऐसा कुछ नहीं है।
बॉम्बे में आप खुद को आउट-साइडर मानते हैं?
कैसे मानूंगा? मेरी जगह है यह। मेरा बच्चा यहां पैदा हुआ है। कैसे मानूंगा मैं? (इसके अलावा भी काफी कुछ कहा था इस बारे में, वीडियो में सुन सकते हैं।)
लेकिन आउटसाइडर इन द सेन्स, मैं प्रोफेशनली आउटसाइडर की बात कर रहा हूं। जिसमें थियेटर वालों को हमेशा थोड़ा सा सौतेला व्यवहार दिया जाता है यहां पर।
नहीं नहीं। उल्टा है भाई! थियेटर वालों को बल्कि…
स्टार सिस्टम ने कभी थियेटर वालों को वो इज़्ज़त नहीं दी…
हां… स्टार सिस्टम है। स्टार सिस्टम की ज़रूरत है। थियेटर वालों को मालूम ही नहीं कि बुनियादी ढांचा कैसे होता है। मैं तो बड़ा सोचता रहा कि खूबसूरत बंदे क्यूं थियेटर पैदा नहीं कर पाया। मैं समझ ही नहीं पाया आज तक! थियेटर वाले होते हैं, मेरे जैसी शकल सूरत होती है उनकी टेढ़ी-मेढ़ी सी।
लेकिन ऐसा कुछ नहीं है… आज… नसीर हैं, ओम पुरी हैं… दे आर रेकग्नाइज़्ड। अनुपम खेर हैं…
नहीं, वह बात है कि उनको इज़्ज़त ज़रूर मिलती है लेकिन उनको इज़्ज़त दे कर पेडेस्टल पे रख दिया जाता है, लेकिन उससे आगे बढ़ने की कभी भी शायद…
आगे बढ़ने की सबकी अपनी अपनी क़ाबिलियत है। और जितना आगे बढ़ना था, जितना सोच के नहीं आये थे, उससे आगे बढ़े ये लोग। पैसे से लेकर नाम तक। इससे बेहतर क्या लोगे आप।
पुराने दिनों के बारे में, ख़ास कर के ‘एन ईवनिंग विद पीयूष मिश्रा’ होता था…
तीन प्लेज़ थे एक-एक घंटे के। पहला ’दूसरी दुनिया’ था निर्मल वर्मा साब का, दूसरा ’वॉटेवर हैपंड टू बेट्टी लेमन’ (अरनॉल्ड वास्कर का), तीसरा विजयदान देथा का ‘दुविधा’। तब पैसे नहीं थे, प्लेटफॉर्म था नहीं… आउट ऑफ रेस्टलेसनेस किया था। वह फॉर्म बन गया भई कि नया फॉर्म बनाया है। फॉर्म-वार्म कुछ नहीं था। ‘एक्ट वन’ मैंने जब छोड़ा था ‘95 में, ऑलमोस्ट मुझे लगा था की मैं ख़तम हो गया। ‘एक्ट वन’ वाज़ मोर लाइक ए फैमिली। और वहां से निकलने के बाद यह नयी चीज़ आयी।
(असली सवाल पर आते हुए) मेरे लिए ज़्यादा फैसिनेटिंग यह था कि उसकी ब्रान्डिंग, सेलिंग पॉइंट था आपका नाम। 1996 में दिल्ली में आपके नाम से प्ले चल रहा था, कहानियों के नाम से या लेखक के नाम से या नाटक के नाम से नहीं, आपके नाम से परफॉर्मेन्स हो रही थी। बॉम्बे ने अब जा कर रेकग्नाइज़ किया है…
‘झूम बराबर झूम’ में काम किया, वो चल नहीं पायी। ‘मक़बूल’ में काम किया, उसका ज़्यादा श्रेय पंकज कपूर और इरफ़ान को मिला… वो भी अच्छे एक्टर हैं… पर पता नहीं कुछ कारणों से, ‘मक़बूल’ में बहुत तारीफ़ के बावजूद रेकग्निशन नहीं मिला। ‘आजा नच ले’ में काम किया, उसका लास्ट का ओपेरा लिखा… ऐसा हुआ कि बस यह फिल्म (गुलाल) बड़ी ब्लेसिंग बन कर आयी मुझ पर। जितना काम था, सब एक साथ निकालो। लोग रेस्पेक्ट करते थे… जानते थे भाई यह हैं पीयूष मिश्रा। लेकिन ऐसा कुछ हो जाएगा, यह नहीं सोचा था।
गुलाल की बात करें तो… उसमें यह दुनिया अगर मिल भी जाए है, बिस्मिल की नज़्म है, कुछ पुराने गानों में भी री-इंटरप्रेटेशन किया है. इस सब के बीच आप मौलिकता किसे मानते हैं?
एक लाइन ली है… एक लाइन के बाद तो हमने सारा का सारा री-क्रिएट किया है। जितनी यह बातें हैं… वो आज की जेनरेशन की ज़ुबान बदल चुकी है। और आप उन्हें दोष भी नहीं दे सकते। अब नहीं है तो नहीं है, क्या करें। लेकिन उसी का सब-टेक्स्ट आज की जेनरेशन को आप कम्‍युनिकेट करना चाहें, कि कहा बिस्मिल ने था… ऐसा कुछ कहा था – कम्‍युनिकेशन के लिए फिर प्यूरिस्ट होने की ज़रूरत नहीं है आपको कि बहुत ऐसी बात करें कि नहीं यार जैसा लिखा गया है वैसा। और ऐसा नहीं है कि उनको मीनिंग दिया गया है। नहीं – यह नयी ही पोएट्री है।
फिर भी, मौलिकता का जो सवाल है, फिल्म इंडस्ट्री में बार बार उठता है। संगीत को लेकर, कहानियों को लेकर, उस पर आपका क्या टेक है?
मालूम नहीं… इंस्पिरेशन के नाम पर यहाँ पूरा टीप देते हैं. सारा का सारा, पूरा मार लेते हैं.
आपके ही नाटक ‘गगन दमामा बाज्यो’ पर ‘लेजेंड ऑफ भगत सिंह’ बनाया गया। वहां मौलिकता को लेकर दूसरी तरह का डिबेट था।
वहां पर जो है की फिर यू हैव टू बी रियल प्रोफेशनल. बॉम्बे का प्रोफेशनल! कैसे एग्रीमेंट होता है… मुझे उस वक़्त कुछ नहीं मालूम था। उस वक़्त मैं कर लिया करता था। हां भाई, चलो, आपके लिए कर रहे हैं मतलब आपके लिए कर रहे हैं। वहां फिर धंधे का सवाल है।
‘ब्लैक फ्राइडे’ के गाने भी आपके ही थे। उनको उतना रेकग्निशन नहीं मिला जितना गुलाल को मिला।
हूं… हूं… नहीं इंडियन ओशियन का वह गाना तो बहुत हिट है। उनका करियर बेस्ट है अभी तक का गाना। (‘अरे रुक जा रे बंदे’)… लाइव कॉन्सर्ट करते हैं… उन्हीं के हिसाब से, दैट्स देयर ग्रेटेस्ट हिट! लेकिन अगर ‘ब्लैक फ्राइडे’ सुपरहिट हो जाती, मालूम पड़ता पीयूष मिश्रा ने लिखा है गाना तो… सिनेमा के चलने से बहुत बहुत फ़र्क पड़ता है। हम थियेटर वालों को थोड़ी हार मान लेनी चाहिए कि सिनेमा का मुक़ाबला नहीं कर सकते। वो तब तक नहीं होगा जब तक कि यहां (थियेटर की) इंडस्ट्री नहीं होगी। और इंडस्ट्री यहां पर होने का बहुत… यह देश इतना ज़्यादा हिन्दीवादी है ना… गतिशील ही नहीं है। यहां पर ट्रेडिशन ने सारी गति को रोक कर रख दिया है। हिन्दी-प्रयोग! पता नहीं क्या होता है हिन्दी प्रयोग? जो पसंद आ रहा है वो करो ना। हिन्दी नाटक… भाष्य हिन्दी का होना चाहिए, अरे हिन्दी भाष्य में कोई नहीं लिख रहा है नाटक यार। कोई ले दे के एक हिन्दी का नाटक आ जाता है तो लोग-बाग पागल हो जाता है की हिन्दी का नाटक आ गया! अब उन्हें नाटक से अधिक हिन्दी का नाटक चाहिए। लैंग्वेज के प्रति इतने ज़्यादा मुग्ध हैं… मैने जितने प्लेज़ लिखे उनमें से एक हिन्दी का नहीं था, सब हिन्दुस्तानी प्लेज़ थे।
एकेडमीशियन और थिएटर करने वालों में कोई फ़र्क नहीं (रह गया) है। जितने बड़े बड़े थिएटर के नाम हैं, सब एकेडमीशियन हैं। करने वाले बंदे ही अलग हैं। करने वाले बंदों को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। “यह नाटक कर रहा है… लेकिन वी नो ऑल अबाउट नाट्य-शास्त्र!” अरे जाओ, पढ़ाओ बच्चों को…
लेकिन आपका मानना है कि बॉम्बे में थियेटर चल रहा है… दिल्ली के मुक़ाबले।
दिल्ली में लुप्त हो गया है। दिल्ली में बाबू-शाही की क्रांति के तहत आया था थिएटर। (नकल उतारते हुए) “नाटक में क्या होना चाहिए – जज़्बा होना चाहिए! जज़्बा कैसा? लेफ्ट का होना चाहिए।” एक्सपेरिमेंटेशन भी पता नहीं कैसा! यहां पर देखो, यह अभी भी चल रहा है – मानव (कौल) ने लिखा है

रेखा और अमिताभ - अब्दुल्ला





रोकश रोशन रेखा के दोस्‍त हैं। उन्‍होंने अच्‍छे दोस्‍त की तरह रेखा को खून भरी मांग जैसी फिल्‍म दी। और भी निर्देशकों ने कोशिश की, लेकिन रेखा स्‍वयं में ही खो गयीं। वह पूरी दुनिया से कट गयीं। आप देखें कि वह जब भी किसी सार्वजनिक जगह पर जाती हैं, तो अपने अपीयरेंस को लेकर परेशान रहती हैं। अमिताभ बच्‍चन की जीवनी में रेखा काले धब्‍बे की तरह हैं। एक टीवी प्रोग्राम में मैंने हाल ही में देखा कि रेखा को अपनी सीट की तरफ आता देख अमिताभ वहां से उठ कर चले गये। वह देख कर मुझे लगा कि दोनों के बीच कोई चक्‍कर है। अचानक उठना और चल देना वास्‍तव में मुंह छिपाने की तरह है। रेखा से भागने की तरह है… अगर आपके अंदर कोई चोर नहीं है, तो आप ऐसा क्‍यों करेंगे? मुझे लगता है कि अमिताभ पहले दिन से ही रेखा को लेकर गंभीर नहीं थे। इसके अलावा वे बहुत ही ज़्यादा क्‍लास कंशस भी हैं।
अमिताभ किसी ऐसे व्‍यक्ति को पसंद नहीं करते थे, जो उनसे ज्‍यादा पॉपुलर हो और बेहतर काम कर रहा हो। अमजद खान से उनकी अच्‍छी दोस्‍ती थी। दोनों की जोड़ी पर्दे पर पॉपुलर थी, लेकिन अचानक कुछ हुआ और दोस्‍ती ख़त्‍म हो गयी। अमिताभ दूसरों से रश्‍क करते हैं। उनके अंदर ज़बर्दस्‍त ईर्ष्‍या है।
मुझे लगता है कि हृषीकेश मुखर्जी ने उनके स्‍वभाव के इस पहलू को समझा था। अभिमान बनाते समय उन्‍होंने इसे उकेरा। मैं हृषी दा से भी मिली। जया चाहती थीं कि मैं उनसे ज़रूर मिलूं। मैं जिस दिन उनसे मिलने गयी, उस दिन अमिताभ ने मुझे गाड़ी से नहीं भेजा। उन्‍होंने मुझे ऑटो से भेजा। निश्चित ही वे नहीं चाहते थे कि मैं हृषी दा से मिलूं। मेरे ख्‍याल से हृषी दा जया के कैंप के थे। उन्‍होंने अमिताभ की ईर्ष्‍या को अभिमान में अच्‍छी तरह दिखाया। वे अमिताभ का स्‍वभाव समझ गये थे। हृषी दा से मुलाकात हुई, तो उन्‍होंने अमिताभ को अधिक तवज्‍जो नहीं दी
जया सामान्‍य रूप से अमिताभ से नाराज़ रहती थीं। वे अमिताभ के मूड को समझ नहीं पाती थीं और रिश्‍ते में बनायी दूरी से खीझती थीं। वे हमेशा शिक़ायती लहजे में बातें करती थीं। जया चाहती थीं कि वे फिर से राजनीति में जाएं। लेकिन अमिताभ को चुप कराना आता है। वे अपने विश्‍वास में इतने दृढ़ हैं कि आप टस से मस नहीं कर सकते। इसलिए ऐसा लगता था कि सामान्‍य बातचीत में भी जया उनसे बहस कर रही हैं। मैं जया को दोषी नहीं मानती। उन्‍हें मुसी‍बतें झेलनी पड़ी थीं। मैंने उनसे कहा था कि इस व्‍यक्ति के साथ आपकी शादी खुशहाल नहीं हो सकती, क्‍योंकि वे अपने दिमाग़ में अकेले हैं। वे दूसरों के नज़रिये से नहीं सोचते। वे परिवार का पालन एक धर्म के तहत करते हैं। अमिताभ के व्‍यक्तित्‍व में एकाधिकार की प्रवृति है, लेकिन वे एकाधिकारवादी पुरुष नहीं हैं। वे पुरुष अहमन्‍यता के शिकार लगते हैं, लेकिन हैं नहीं।
अमिताभ और जया नज़रें चुरा कर बातें करते हैं। वे आंखों में आंखें डाल कर बातें नहीं करते। दोनों के सोचने के तरीक़े अलग हैं। वे दो अलग व्‍यक्तियों की तरह हैं। अमिताभ के वजूद का मतलब है जया की समाप्ति। उनके परिवार में कभी तलाक की बात सुनी नहीं गयी। वे स्‍पष्‍ट हैं कि उनकी शादी एक सामाजिक संस्‍कार है, जिसे उन्‍हें निभाना है। अमिताभ के लिए विवाह कर्तव्‍य रहा है, उसमें प्‍यार नहीं है। अमिताभ श्‍वेता के अधिक करीब हैं।
अभिषेक अपनी सीमाएं जानते हैं। उनकी छवि अपने पिता जैसी नहीं है। उन्‍होंने समर्पण कर दिया है। पिता के साये में जीने और एडजस्‍ट करने में थोड़ी दिक्‍कत होती है, लेकिन वह हालात के अनुसार बदलना जानते हैं।
जया मेरे लिए गाड़‍ियों का इंतजाम करती थीं कि मैं लोगों से जाकर मिल सकूं। मेरे लिए लजीज़ खाने भिजवाती थीं। मैं उन्‍हें उस बात की याद कैसे दिला सकती थी, जो उनके खिलाफ़ जाती थी। मैंने अमिताभ और रेखा के बारे में पढ़ा था। अमिताभ ने अपने अहं की तुष्टि के लिए रेखा का इस्‍तेमाल किया। वे देखना चाहते थे कि कोई औरत उनके लिए किस हद तक जा सकती है। साथ ही वे यह भी जानना चाहते थे कि औरतों पर उनका क्‍या प्रभाव है। लेकिन रेखा ने सब कुछ खो दिया। वह अमिताभ के लिए खूबसूरत बनी, लेकिन अमिताभ के प्रेम ने रेखा को हमेशा के लिए दासी बना दिया।


मैंने अमिताभ बच्‍चन को एक विषय की तरह पढ़ा। उन कारणों की खोज की, जिन से ऐसी स्थिति बनी कि अमिताभ बच्‍चन सुपरस्‍टार बन गए।
♦ मैंने एम फिल का शोध प्रबंध अमिताभ बच्‍चन के पास भेजा। उन्‍होंने पलट कर मुझे कॉल किया और मुंबई आमंत्रित किया। सेंटूर होटल में मेरे रहने की व्‍यवस्‍था की। घर से अपनी रसोई में बने लजीज खाने भिजवाए। मैं उनके परिवार से मिली। माता-पिता, जया, बच्‍चे और अजिताभ। मैं उनके दोस्‍त रोमेश शर्मा से मिली। उनके सहकर्मियों से मिली। मैं अमिताभ से मोहासक्‍त नहीं थी। किसी भी स्‍टार का सही प्रशंसक उसके बारे में सब कुछ पहले से जानता है।
♦ वे अच्‍छा खाते थे और खास स्‍वाद ही चाहते थे। वे हर तरह की चाय और काफी पीते थे। मैंने उन्‍हें स्‍वाद लेकर रेड वाइन पीते देखा था। वे अलकोहल नहीं लेते थे। उन्‍हें मांसाहारी भोजन अधिक पसंद नहीं था। हालांकि वे सिगरेट और शराब नहीं पीते थे, लेकिन नशेबाज का व्‍यक्तित्‍व था उनका। वे जितना अधिक सोचते और बतियाते थे, उतना ही अधिक चाय और काफी पीते थे।
♦ मैंने पाया कि वे अपने माता-पिता के भक्‍त और बच्‍चों से बहुत प्‍यार करते हैं, लेकिन जया से उनके तार सही तरीके से नहीं मिले हैं। अमिताभ का व्‍यक्तित्‍व एकाकी है। वे अच्‍छी तरह परिभाषित भूमिकाओं में अपने व्‍यक्तित्‍व का एक हिस्‍सा देते हैं। वे अच्‍छे बेटे और पिता हैं और सबकुछ मुहैया कराने वाले पति हैं। लेकिन जहां तक उनकी अपनी बात है, वे एकांतप्रिय व्‍यक्ति हैं। वे एक घेरा बना लेते हैं, जिसे उनकी बीवी भी नहीं तोड़ पातीं। वे खामोश रहना पसंद करते हैं।
♦ उनकी एक आदत है कि वे एक खोल से निकलकर दूसरे खोल में घुस जाते हैं। व्‍यक्तित्‍व बदल लेते हैं। अमिताभ एक नहीं है। वे अपनी खोल से निकल कर एक साथ कई व्‍यक्ति बन जाते हैं। आप के सामने एक अमिताभ का एक शरीर खड़ा रहता है, लेकिन मानसिक स्‍तर पर कई अमिताभ वहां होते हैं। और किस समय कौन से अमिताभ आप के सामने हैं… आप नहीं जान सकते। मैंने महसूस किया कि पति-पत्‍नी के बीच के तार टूटे हुए हैं। उन दिनों बेटे से भी उनका अधिक जुड़ाव नहीं था। मुझे लगा कि बच्‍चे मां के अधिक करीब हैं…


राज ठाकरे मित्र
बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन ने कहा है कि राज ठाकरे उनके मित्र और मिलनसार आदमी हैं। उन्होंने कहा कि बहुत दिनों से वो राज से मिले नहीं हैं लेकिन जब मिलेंगे तो वो कहेंगे कि आपने जो कहा था, उसमें ये निराधार है और अगर हमसे कुछ ग़लती हुई होगी, तो माफी मांग लेंगे। अमिताभ ने कहा कि देश में लोकतंत्र है और हर किसी को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है।
राहुल गांधी के लिए शुभकामना
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के बारे में पूछने पर अमिताभ ने कहा, “राहुल नौजवान हैं, उनमें बहुत जोश है और उनको मेरी तरफ से शुभकामना है।” लेकिन राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना पर उन्होंने कहा, “ये तो जनता बताएगी।” उन्होंने कहा कि उनके परिवार में हरिवंश राय बच्चन के समय से ही नेहरू-गांधी परिवार का मान रहा है। उन्होंने कहा कि राजीव गांधी उनके मित्र थे और गांधी परिवार में दुर्घटना के बाद उन्हें लगा कि उनको राजीव के पीछे खड़े होना चाहिए, तो वो इलाहाबाद से लड़ गये।
मुझे राजनीति नहीं आती
उन्होंने कहा कि उस समय चुनाव लड़ने का फैसला उन्होंने किसी दबाव में नहीं बल्कि पूरे मन से लिया था। अमिताभ ने कहा कि जब संसद में उन्हें लगा कि जनता ने उन्हें जिस काम के लिए भेजा है, वो उसे कर नहीं पा रहे हैं तो उन्होंने राजनीति छोड़ दी। उन्होंने कहा कि मैंने राजनीति से हार मान ली क्योंकि मुझे वो आती नहीं है।
गांधी परिवार से दूरी के कारणों पर नहीं देंगे जवाब
जब अमिताभ से यह पूछा गया कि वो कौन-सी वजह है, जिसके कारण गांधी-बच्चन परिवार में दूरी आयी, तो उन्होंने इसका जवाब देने से इनकार कर दिया। जब उनसे यह पूछा गया कि क्या अमर सिंह दोनों परिवार को फिर साथ ला सकते हैं तो अमिताभ का जवाब था, “अमर जी इस मंशा से वहां नहीं जाते।” उन्होंने कहा कि अमर सिंह उनके मित्र नहीं बल्कि उनके परिवार के सदस्य हैं। उन्होंने कहा कि अगर बच्चन परिवार के साथ जो अच्छा-बुरा होता है, वो अमर सिंह पर भी उसी तरह बीतती है और जब अमर सिंह के साथ कुछ अच्छा-बुरा होता है तो वो बच्चन परिवार पर भी उसी तरह बीतती है।
रिटायर जनता करेगी
अमिताभ ने रिटायरमेंट के सवाल पर कहा कि रिटायर जनता करेगी। उन्होंने कहा कि जब लोग कह देंगे कि बहुत देख लिया आपको, अब आप भाग जाओ, तो बैठ जाएंगे। उन्होंने कहा कि एक बार नब्बे के दशक में उन्होंने चार-पांच साल की छुट्टी ली थी लेकिन इसके बावजूद वो नहीं कर पाये, जो वो करना चाहते थे। उन्होंने बताया कि फिर एक दिन वो यश चोपड़ा के पास गये और उनसे कहा कि वो फिल्म करना चाहते हैं और मोहब्बतें फिल्म में काम किया। उन्होंने कहा कि फिर उन्होंने कौन बनेगा करोड़पति में काम किया और इससे हुई कमाई से एबीसीएल के नाकाम होने के कारण खुद पर चढ़े कर्ज़ को चुकता किया।
फिर डुबकी लगाने में बहुत कष्ट हुआ
उन्होंने कहा कि पांच साल की छुट्टी के बाद जब वो लौटे, तो बॉलीवुड में बहुत पानी बह चुका था और उन्हें फिर से डुबकी लगाने में बहुत कष्ट उठाना पड़ा। अमिताभ ने बताया कि एबीसीएल को शुरू करने के लिए जब उन्हें पैसों की जरूरत हुई, तो उन्हें 15 करोड़ और जया बच्चन को 3 करोड़ का आंक कर 18 करोड़ का कर्ज़ दिया गया था। अमिताभ ने कहा कि एबीसीएल से उन्हें कॉरपोरेशन और वित्तीय क्षेत्र का अनुभव मिला और अब वो कोई भी फ़ैसला सोच-समझ कर, सलाह लेकर ही करते हैं, जिसके अभाव में एबीसीएल दिवालिया हो गयी थी।
रियलटी शो में काम नहीं कर सकता
अमिताभ ने कहा कि वो रियलटी शो में काम नहीं कर सकते क्योंकि वो खुद को इसके लायक नहीं मानते। उन्होंने कहा कि 84 दिन तक बिना अखबार, बिना फोन, परिवार से दूर रह पाना और फिर नोंक-झोंक उनके वश की बात नहीं है। उन्होंने कहा कि वो इस समय रियलटी शो को बहुत नज़दीक से देख रहे हैं और उनका मानना है कि इनमें हिस्सा लेना बहुत ही मुश्किल काम है।
“गुरु” वाले अभिषेक सबसे ज़्यादा पसंद
अमिताभ ने कहा कि अभिषेक बच्चन की फिल्मों में उन्हें “गुरु” का काम सबसे ज़्यादा पसंद आया। उन्होंने कहा कि अभिषेक को कम समय में ही इतनी चुनौतीपूर्ण भूमिका मिल गयी, जिसे उन्होंने बखूबी पेश भी किया।
मिले तो अच्छा, न मिले तो और अच्छा…
अमिताभ ने कहा कि अगर कोई कलाकार यह कह दे कि उसने सब कुछ कर लिया है, तो उसकी मौत हो जाएगी। उन्होंने कहा कि एक कलाकार के मन में अधूरापन अच्छा होता है क्योंकि आपमें कुछ और करने की भूख बची रहती है। उन्होंने कहा कि उनके पिताजी ने सिखाया था कि चाही हुई चीज़ मिल जाए तो अच्छा और न मिले तो और भी अच्छा, क्योंकि फिर तो वो ईश्वर की इच्छा होगी।
न टीवी छोटा और न फिल्म बड़ी
अमिताभ ने कहा कि टीवी का पर्दा न तो छोटा है और न फिल्म का पर्दा बहुत बड़ा। दोनों जगह लोग कलाकार रचनात्मक काम करते हैं और पूरी मेहनत से करते हैं। उन्होंने कहा कि वो वही विज्ञापन करते हैं, जो उन्हें उचित लगता है। उन्होंने कहा कि वो शराब, सिगरेट या तंबाकू का सेवन नहीं करते इसलिए इनका विज्ञापन भी नहीं करते।